जब महामारी ने 2000000 को मार दिया था

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एक समय ऐसा भी आया था जब पूरे शहर के शहर उजड़ गए थे, सड़कों पर कूड़े के ढेर लग गये थे और हर जगह दिखाई देते थे तो बस चूहे. मध्य युग में यूरोप में तबाही मचाने वाली एक बीमारी ने लाखों लोगों को मार दिया था और हमारे सामने एक डरावना सवाल छोड़ दिया था, और वह सवाल हमारे पास आज भी है कि अगर फिर से दुनिया में इस तरह की बीमारी फैली तो क्या होगा?

20 लाख से ज़्यादा लोग इस प्लेग की वजह से मर गए थे. और सब मौतों का ज़िम्मेदार था केवल एक बैक्टीरिया जिसमें छह सालों में लगभग 20 लाख लोगों को मार दिया था. आइए चलते हैं साल 1346 में। जहाँ काफा नाम के शहर में लोग दिन भर की थकान के बाद सो रहे हैं और तभी रात को एक भयंकर शोर से जागते हैं और महसूस करते हैं कि उनका शहर पूरी तरह से निर्दयी टार्टर योद्धाओं से घिरा हुआ है. कफ़ा के निवासी एक भयंकर शोर से जागते हैं और महसूस करते हैं कि शहर पूरी तरह से बुरे टार्टर योद्धाओं से घिरा हुआ है।

इस शहर के पास अपनी कोई सेना नहीं थी और इस वजह से इनके पास ऐसा कोई विकल्प नहीं था जिससे वे प्रतिरोध कर सकते थे, और उन्हें लगने लगा था की कुछ ही क्षणों में यह शहर ख़त्म हो जाएगा. हम सब एक बात जानते हैं कि जब हम किसी हाल में होने के होने का इंतज़ार कर रहे हो तब उस बीच कुछ भी अप्रत्याशित होने पर सब कुछ बदल जाता है. कुछ ऐसा ही यहाँ पर भी हुआ, जो टार्टर योद्धा था इस शहर को तबाह करने के लिए आए थे वे किसी रहस्यमय बीमारी का शिकार हो गए और इस वजह से टार्टर सैनिक दिवार के आस पास भरने लगें और मरने वालों की गिनती धीरे धीरे बढ़ने लगी. काफा के निवासी यह देखकर ख़ुश हुए लेकिन उनकी यह ख़ुशी भी कुछ देर तक ही रही जब आक्रमणकारियों ने इतिहास में पहले जैविक हथियारों में से एक को तैनात करना शुरू कर दिया. गुलेल का उपयोग करते हुए उन्होंने सड़े हुए शवों को शहर मैं फेंकना शुरू कर दिया. और इस वजह से शहर के निवासियों में भी वह रहस्यमय बीमारी फैल गई और जिससे इस रहस्यमय बीमारी के पीड़ितों की संख्या और अधिक हो गई. लोग इतने हताश हो गये कि उन्होंने शहर छोड़ने का निर्णय कर लिया और वे इटली के लिए बंधे जहाज़ों पर निकल पड़े. लेकिन शायद यह नहीं जानते थे कि वह इटली में अपने साथ कुछ और भी लेकर जा रहे हैं और वह थी एक रहस्यमय बीमारी.

इस रहस्यमय बीमारी को काली मौत नाम दिया गया जोकि पूरे यूरोप में फैल गई है और जिसकी वजह से लाखों मौतें हुई. क्या आप जानते हैं कि मध्य युग के इतिहास में यह सबसे ख़राब महामारी थी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मध्य युग आख़िर था क्या? जब भी मध्य युग के बारे में बात होती है तो सबसे पहले जो हमारे दिमाग़ में आता है वह होता है महल.

ये संरचनाएँ मध्य युग की प्रतीक हैं। लेकिन उसी समय उस दौर की कहानी टावरों, राजाओं और राजकुमारियों से आगे निकल जाती है, जब एक रहस्यमय बीमारी सब को परेशान कर देती है। मध्य युग 5 वीं शताब्दी में शुरू हुआ और 15 वीं शताब्दी में समाप्त हुआ। दूसरे शब्दों में, यह युग लगभग 1000 साल तक चला। और मैंने कफ़्फ़े शहर के बारे में जो कहानी बताई है, वह मध्य युग के दूसरे कालखंड के दौरान हुई थी, जो मध्य युग की शुरुआत थी, जो कि वर्ष 1000 के आसपास शुरू हुई थी, एक ऐसा समय जब यूरोप में कई चीजें बदल चुकी थी। 14 वीं शताब्दी की शुरुआत में जलवायु परिवर्तन ने सर्दियों को और ठंडा कर दिया था और कुछ वर्षों के लिए गर्मियों मैं बारिश होने लगी थी। इससे यूरोप में खाद्य उत्पादन बहुत कम हो गया। यह महान अकाल था।

महा अकाल

इस अकाल के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब लोगों के पास कोई भोजन नहीं था, और महाद्वीप की आबादी का 10% से 25% तक सफ़ाया हो चुका था। उस अवधि में, प्रसिद्ध सौ साल का युद्ध हुआ था। एक सदी से अधिक समय तक, फ्रांस और इंग्लैंड के हजारों सैनिकों ने एक दूसरे को प्रतिदिन मारा क्योंकि वह फ़्रांसिस सिंघासन पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे। और फिर, ब्लैक डेथ। उस दौरान, इसने 20 लाख से अधिक लोगों को मार डाला। यह गरीबी, युद्ध और राजनीतिक साज़िश के साथ इतिहास में सबसे अधिक विकराल काल में से एक था। इस तरह की दुनिया में रहने का मतलब आपके पास हिम्मत हो और आपका भाग्य का साथ दे। यह एक अंतहीन दुःस्वप्न की तरह था, जो लगता था कि कभी ख़त्म नहीं होगा और इस ग्रह से इंसान का नामो निशान मिट जाएगा।

आइए देखते हैं कि मध्य युग में कितना आतंक था.

उस दौर में जीवन बेहद कठिन था। ज्यादातर समय, नौकर एक ही सीलन वाले, अंधेरे कमरे के साथ झोंपड़ियों में रहते थे, जहाँ वे सोते थे, और भोजन और जानवरों को संग्रहीत करते थे। सर्दियों के दौरान गर्मी लेने के लिए पूरे परिवार भूसे के गद्दों पर सोते थे। वे लोग दिन के समय जागते थे और रात होने तक लगातार काम करते थे। यह उन बच्चों पर भी लागू होता है, जो पाँच साल की उम्र से काम करना शुरू कर देते थे। शहरों में, संकीर्ण और अंधेरे गलियों के बीच, जीवन और भी अधिक अराजक था। सीवेज ही नहीं था, सब कुछ गंदगी से भरा हुआ था, और लोग कचरा, मानव अपशिष्ट और यहां तक ​​कि मृत जानवरों के साथ चलते और खाते थे। भोजन मूल रूप से सब्जियों और हड्डियों से बना ब्रेड और सूप था, क्योंकि मांस और पनीर आम लोगों के लिए बहुत महंगे थे, जिनके पास सड़ा हुआ भोजन खाने के अलावा कोई विकल्प था। स्वच्छता या स्वास्थ्य की कोई चिंता नहीं थी। लोगों गंदे हाथों से खाना खा लेते थे, मौखिक स्वच्छता नहीं थी और मूल रूप से स्नान करना या ना करना एक बराबर था। कई लोगों के लिए, सालों तक हर दिन एक ही अंतर्वस्त्र पहनना सामान्य था।

काली मौत बुबोनिक प्लेग की महामारी थी जो पूरे यूरोप में अविश्वसनीय रूप से तेजी से फैल गई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि 1347 से 1352 तक इस बीमारी ने 15 से 234 लाख यूरोपीय लोगों को मार दिया था। यह बीमारी की सबसे क्रूर अवधि थी जिसने संभवतः उस समय 75 से 200 लाख लोगों को मार दिया था, और उस समय दुनिया की आबादी में लगभग 365 लाख लोग थे। दुनिया की आबादी इस बीमारी से पहले पढ़ रही थी लेकिन प्लेग के कारण पहली बार मानव जाति की आबादी इस क़दर घट गई थी. मध्य युग के बारे में मैंने जो कुछ भी कहा वह यूरोप में हुआ लेकिन दुनिया भर में अन्य सभ्यताएं भी थीं। हाँ सभ्यताओं के अलावा वहाँ सूक्ष्मजीवों के बारे में मानव जाति को पता नहीं था।

इस अजीब और खतरनाक छोटे जीव की तरह।

यर्सिनिया पेस्टिस, बैक्टीरिया का एक प्रारूप यर्सिनिया स्यूडोथुबरकुलोसिस जिसका हज़ार वर्षों तक उत्परिवर्तन (mutation) हुआ और इसके बाद उसका उत्परिवर्तन समाप्त हो गया। यह बैक्टीरिया संक्रमण का कारण बनता है, और यह बुबोनिक प्लेग का सबसे आम रूप है। इस बीमारी के लक्षण ही ऐसे हैं जिन्हें देखकर पता चलता है कि बीमारी इतनी डरावनी क्यों है। जैसे ही संक्रमण शरीर में होता है, बुखार, ठंड लगना, कमजोरी और सिरदर्द शुरू होता है। चूंकि बैक्टीरिया शरीर के अन्य हिस्सों में ही आक्रमण करता है, इसलिए शरीर के बाहरी हिस्सों में सूजन आ जाती है, जो काफ़ी पीड़ादायक होती है, विशेष रूप से गर्दन, बगल और कमर पर, जो मवाद से भरे घाव में फटने से पहले सेब के आकार तक बढ़ सकता है। इन सूजे हुए लिम्फ नोड्स को बुबोस के रूप में भी जाना जाता है, यह इतना विशिष्ट है कि लोगों ने उनके नाम पर बीमारी का नाम दिया ब्यूबोनिक प्लेग।

लिम्फ नोड्स छोटे रक्षा अंग हैं जो लोगों के शरीर में फैले होते हैं। जब कोई विदेशी बैक्टीरिया शरीर के अंदर दाख़िल होता है, तो वे इस पर हमला करने के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन शुरू करते हैं। और, ब्यूबोनिक प्लेग को लिम्फ नोड्स के नाम पर रखा गया है। यदि कोई इस बीमारी की चपेट में आता है तो लिम्फ नोड्स, जो आमतौर पर गर्दन, बगल और कमर पर स्थित होते है, उनके अंदर सूजन शुरू होती है जो साफ़ दिखाई देती है। लोग सूजन को "उभार" या "बुबोस" कहते हैं। इसलिए इसे बुबोनिक प्लेग का नाम दिया गया था। रोग अन्य तरीकों से भी प्रकट हो सकता है। जैसे न्यूमोनिक प्लेग, जो श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। और सेप्टिकैमिक प्लेग, जिसमें बैक्टीरिया रक्तप्रवाह को प्रभावित करता है।

और इसे काली मौत क्यों कहा जाता है?

यह शब्द मध्य युग में एक और लक्षण के कारण इस्तेमाल किया गया था। कई लोगों के घाव में बिना इलाज के और ज़्यादा बढ़ रहे थे और वह उनके शरीर की चरम सीमा तक पहुँच गया है जैसे हाथों और पैरों में गैंगरीन। उनके गाँव वाले हिस्से की त्वचा काली पड़ गई थी और ऐसा लग रहा था कि जैसे उस त्वचा में कोई जान नहीं बची है.। इसलिए, इसे ब्लैक प्लेग या ब्लैक डेथ नाम दिया गया। वैसे समय समय पर हम अपनी शब्दावली अपडेट करते हैं और उसी के तहत यह शब्दावलियाँ भी हमारे पास होती है जैसे काली मौत काला बाज़ार आदि लेकिन कभी कबार भी अपमानजनक हो सकती है और एक प्रकार के जातीय भेदभाव को भी मज़बूत कर सकते हैं लेकिन जब यह बीमारी फैली थी तब यह वास्तव में आक्रामक थी और संक्रमित इंसान की मौत कुछ ही दिनों में हो जाती थी. आइए देखते हैं कि यह कैसे इतनी जल्दी फैलती थी.

बबोनिक प्लेग का कारण बनने वाले बैक्टीरिया पिस्सुओं (rodent fleas) के अंदर रहना पसंद करते हैं। चूंकि 14 वीं शताब्दी की शुरुआत में एशिया में भयंकर बाढ़ आई थी, इसलिए संक्रमित चूहों से भरे इन कृन्तकों (rodents) को अपना घर छोड़ना पड़ा और वे काले चूहों के संपर्क में आ गए, जो लोगों के पास रहते थे। काले चूहों बहुत आसानी से प्रजनन करते थे, और यहां तक ​​कि व्यापारी कारवां और जहाजों में भी रहते थे। चूंकि एशिया में व्यापार वास्तव में तीव्र था, इसलिए बैक्टीरिया महाद्वीप के माध्यम से फैल गया। एक भी पिस्सू का दंश किसी को संक्रमित करने के लिए पर्याप्त था। यूरोपीय यात्री हमेशा एशियाई व्यापार मार्गों को पार कर रहे थे, विशेष रूप से प्रसिद्ध रेशम मार्ग जिसे हम आज सिल्क रोड भी कहते हैं।

धन के साथ-साथ, इन कारवाँ ने एक संक्रमित पिस्सू के सैकड़ों चूहों को पहुँचाया। व्यापारी जहाजों के साथ भी यही हुआ। इस तरह पूरी दुनिया में प्लेग फैलने लगा ।

1346 में, यह बीमारी केवल पूर्वी यूरोप में थी, लेकिन एक साल बाद, यह भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में भी दिखाई दी। अगले पांच वर्षों में, यह इटली, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड और अंत में रूस पर हावी हो चुकी थी। एक अर्थ में, हम कह सकते हैं कि प्लेग लोकतांत्रिक था। इसने अमीर और गरीब, महान और सामान्य के बीच कोई अंतर नहीं किया। आजकल, आप कल्पना कर सकते हैं कि उस समय के सबसे गरीब लोगों को बीमारी से संक्रमित होने का अधिक खतरा था। कुलीनों को इस तरह महल के अंदर संरक्षित किया गया था, जो शक्ति का प्रतीक थे, और सड़कों की गंदगी से दूर थे। लेकिन इन वर्गों में रहने वाले रईसों में immunity नहीं थी। महल की मजबूत और विशाल दीवारें दुश्मन के आक्रमणों को रोक सकती हैं, लेकिन वे प्लेग बैक्टीरिया के खिलाफ मज़बूत नहीं थी। उस समय के अनुसार यह में है स्वच्छता के लिहाज़ से सही नहीं थे। वे नम और अंधेरे थे और इनके अंदर भोजन भंडारण कमरे थे जो सचमुच चूहों के लिए स्वर्ग थे। क्या आप जानते हैं कि एक सिद्धांत यह भी था कि चूहे ही यहाँ खलनायक नहीं है? हाल ही के एक अध्ययन से पता चला है कि इतने कम समय में इतने विशाल क्षेत्र में बीमारी फैलाने के लिए चूहे ही अकेले पर्याप्त नहीं थे। इसलिए वैज्ञानिक ने इस पर और रिसर्च की और तब पता चला कि यह बैक्टीरिया शायद चूहे के पिस्सू में ही नहीं था, बल्कि लोगों के सिर कि जूँ में भी था। यह पूरी तरह से संभव है क्योंकि मध्य युग में स्वच्छता की कमी के साथ, शहर जूँ के लिए दावत की तरह थे, जिसने एक के बाद एक कई लोगों को संक्रमित किया।

आपको थोड़ा अजीब लग सकता है कि जब आप देखेंगे कि किस तरह के कपड़े डॉक्टर पहनते थे जब सत्रहवीं शताब्दी में वे संक्रमित शहरों में लोगों से मिलने जाते थे. और Bubonic प्लेग का कभी ख़ात्मा हुआ ही नहीं इससे संक्रमित मरीज़ उन्नीसवीं शताब्दी तक मिल रहे थे. इसका प्रकोप लंदन में भी हुआ जब 1665-1666 तक क़रीब एक लाख लोग Bubonic प्लेग का शिकार हुए. यह पूरे लंदन की एक चौथाई आबादी थी. स्वच्छता की कमी के कारण कई वर्षों तक लंदन में इस बीमारी के प्रकोप रहा लेकिन वह कम था. सत्रहवीं शताब्दी में जब शहर दीवारों से घिरा हुआ था जो चोरों को तो बाहर रखता था लेकिन शहर के अंदर गंदगी के ढेर लगे रहते थे तब यह प्लेग फिर से आया. और तब इतने लोग मरे के क़ब्रिस्तान भारत है और बहुत से शव शहर में ही पड़े रहे. लोगों ने लाशों को सचमुच सड़कों पर छोड़ दिया था.

जिस तरह के कपड़े थे, माना जाता था कि यह डॉक्टरों की रक्षा कर सकते थे क्योंकि यह चमड़े से बने थे. इसके बाद का आकार काफ़ी बड़ा था जिसमें जड़ी बूटीया और दूसरे पदार्थ थे जो हवा को फिल्टर करते थे. उनका मानना ​​था कि यह बीमारी संक्रमित या मृत लोगों द्वारा जारी की गई बीमारी से फैलती है। सही बात तो यह थी कि कपड़ों से ज़्यादा डॉक्टरों की उपस्थिति थी किसी भी शहर में ज़्यादा भयावह लगती थी. इन शहरों ने ही डॉक्टरों को संक्रमित लोगों के इलाज के लिए रखा था. और इस वजह से ही है डॉक्टर जहाँ कहीं भी शहर में दिखाई देते थे, लोग समझ जाते है कि वह जगह पूरी तरह से संक्रमित थी, और वहाँ हज़ारों लोग मर रहे थे. इसलिए एक तरह से कोई भी उन डॉक्टरों को नहीं देखना चाहता था. हर कोई यह जानता था कि वह जहाँ कहीं भी है लेकिन मौत के क़रीब है.

अधिकांश मामलों में ये सामान्य परिस्थितियों में चिकित्सा का अभ्यास करने से प्रतिबंधित, दूसरे श्रेणी के डॉक्टर थे।

मूल रूप से वे मृत और संक्रमित लोगों की गिनती के लिए शहरों में जाते थे। हालाँकि उन पर यह आरोप भी था की उन्हें परिवारों से शुल्क लिए थे और उनको नक़ली दवाइयां भी लिखी थी. दूसरे शब्दों में, उन्होंने और अधिक पैसा बनाने के लिए लोगों की निराशा का फायदा उठाया। बहुत से लोगों के मन में यह सवाल भी आता है कि जिस तरह से बीमारी फैली और जिस तरह से इतनी जल्दी लोग मरे, बाक़ी सब लोग क्यों नहीं मरे? इस सवाल के जवाब के रूप में, एक परिकल्पना यह है कि बड़ी संख्या में मौतों के बाद, जीवित बचे लोगों में से अधिकांश रोग के प्रति प्रतिरोधी थे। तथ्य यह है कि बुबोनिक प्लेग कभी ठीक नहीं हुआ है। यूरोपीय चिकित्सा ने कभी भी एक निश्चित दवा विकसित नहीं की है जो रोग को खत्म कर दे। हालाँकि लोगों ने अपनी आदतों को भी बदला जिससे संचरण दर कम हुई. उन्होंने स्वच्छता की तकनीकों का उपयोग करना शुरू किया जिसमें सबसे सरल थी समय समय पर हाथ धोना.

प्लेग को दूर रखने का एक अन्य तरीका महासागर को करीब से देखना था। चूंकि जहाज चूहों से भरे हुए थे, तटीय शहरों के लोग जानते थे कि कोई भी जहाज मौत को उनके करीब ला सकता है। डर इतना ​​था कि फ्रांस ने निर्धारित किया कि किनारे पर पहुंचने वाले किसी भी जहाज़ को डॉकिंग से पहले 40 दिनों तक अलग-थलग रहना चाहिए। इससे यह पुष्टि हो सकेगी कि बोर्ड पर कोई भी संक्रमित नहीं था। और यहीं से "Quarantine" शब्द आया। थोड़ा क्रूर लगता है, लेकिन यह बीमारी को अन्य जगहों पर फैलने से रोकने के लिए किया गया था। वास्तव में, इसके बारे में एक दिलचस्प कहानी है जो 17 वीं शताब्दी में इंग्लैंड में हुई थी।

आयम गाँव (Eyam village), जहाँ आज केवल 900 लोग रहते हैं, यह स्थान भी बुबोनिक प्लेग से त्रस्त था। यहां हर दिन बहुत से लोगों की मौत हुई। निवासियों को पता था कि बीमारी अत्यधिक संक्रामक है, इसलिए उन्होंने अपने स्तर पर केवल वही काम किया जो वे कर सकते थे: अपने आप को अलग करना। कोई भी इस शहर में नहीं जा सकता था। उन्होंने उस उद्देश्य के लिए एक रॉक बैरियर भी बनाया। लेकिन लोगों को खाने की ज़रूरत थी, इसलिए वे सिक्कों को सिरका में डुबो देते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि सिरका एक निस्संक्रामक के रूप में काम कर सकता है, और वे सिक्कों को इस तरह चट्टानों में डाल देते थे। आस-पास के गाँव के निवासी आते थे, और सिक्के लेकर यहाँ खाना छोड़ देते थे। यह एक तरीक़े का लंबी दूरी का व्यापार था।

इस गाँव के लोगों ने सचमुच अपना बलिदान दिया, 344 निवासियों की आबादी 100 से भी कम हो गई थी। अब भी, यदि आप इस गाँव में घूमते हैं, तो आप उन लोगों के नाम यहाँ लिखे हुए पा सकते हैं, जिन्होंने प्लेग में अपनी जान गंवा दी। ये आइम गाँव के निवासियों के नाम में से कुछ हैं जो इस बीमारी के शिकार थे। जैसा कि सदियों से चला आ रहा है, ब्राजील सहित पूरे ग्रह में कई स्थानों पर प्लेग के कारण अनगिनत लोगों की मौत हो गई थी। 1899 में, सैंटोस के बंदरगाह पर आने वाला जहाज उन चूहों से भरा था, जिसने ब्राजील के क्षेत्र में बुबोनिक प्लेग फैलाया था। बीमारी फैलने लगी, और अंततः रियो डी जेनेरियो तक पहुंच गयी, जो उस समय ब्राजील की राजधानी थी। महामारी ने सैकड़ों लोगों को संक्रमित किया था, लेकिन सबसे अधिक प्रभावित बंदरगाह क्षेत्र के निवासी और गोदाम के कार्यकर्ता थे। दूसरे शब्दों में, शहर के सबसे गरीब लोग। 1904 में चीजें बदलनी शुरू हुईं। बुबोनिक प्लेग, चेचक और पीला ज्वर की महामारियों से लड़ने के लिए, सरकार ने निरंकुश अभियान चलाया जिसके कारण टीकाकरण इसकी लड़ाई के रूप में जाना जाने लगा। लेकिन सीवेज उपचार में सुधार के लिए उनकी कार्रवाई ने भी पूर्व ब्राजील की राजधानी में बुबोनिक प्लेग को नियंत्रित करने में मदद की।

यह नियंत्रित किया गया था, लेकिन यह पूरी तरह से नहीं मिटा। तो यह बीमारी अभी भी आस-पास है, यहां तक ​​कि लोगों के हाथ धोने की आदत को अपनाने के बावजूद यह बीमारी आस-पास है? चूंकि बैक्टीरिया जंगली जीवों में रहते हैं, इसलिए हम इस बीमारी को नहीं मिटा सकते। आज भी बुबोनिक प्लेग के मामले इधर उधर देखें जाते हैं। 2010 से 2015 तक 3000 से अधिक मामले हुए, जो लगभग 500 मौतों का कारण बने थे। यह संख्या उस समय की तुलना में कम है। लेकिन, हां, बीमारी अभी भी है। और यदि यह बीमारी आसपास है, तो कई कारणों से यह फिर से महामारी का कारण बन सकती है।

सबसे पहले, वैज्ञानिक मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग प्लेग ट्रांसमिशन के गतिशील में हस्तक्षेप कर सकती है, क्योंकि एक पारिस्थितिकी असंतुलन 14 वीं शताब्दी की शुरुआत में अप्रत्याशित परिदृश्य बना सकता था। इसके अलावा, यर्सिनिया पेस्टिस अभी भी उत्परिवर्तन (mutation) से गुजर रहा है और कुछ एंटीबायोटिक दवाओं के लिए प्रतिरोधी (resistance power) बन गया है। तो इसका मतलब आज यह एक बहुत ही खतरनाक बैक्टीरिया बना हुआ है। कभी कभी ऐसा लगने लगता है कि हम फिर से मध्य युग की तरफ़ जा रहे हैं। लेकिन इस महामारी में जानकारी ही बचाव है। इसीलिए अब आपको डरने की जरूरत नहीं है। क्योंकि सब कुछ ठीक है।

2005 में प्लेग का आखिरी मामला ब्राजील में था।

बीमारी अभी भी आसपास है, लेकिन हमारे पास पहले से ही इससे निपटने के तरीके हैं। विज्ञान अपने प्रारंभिक चरण में बुबोनिक प्लेग की पहचान कर सकता है। तो, एंटीबायोटिक लेने से इसका इलाज करना आसान है। लेकिन आप जानते हैं कि इस महामारी ने दुनिया को बदल दिया था. काली मौत इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी। हालाँकि, हम इससे इनकार नहीं कर सकते कि इसने कई क्षेत्रों में हमारे ज्ञान को भी बढ़ाया है। महामारी के बाद, जिस तरह से धीरे धीरे चिकित्सा आगे बढ़ी, उसकी वजह से समाज पूरी तरह बदल गया।

सर्जनों का महत्व और भी स्पष्ट हो गया, और अस्पतालों को भी एक नया महत्व मिला। वह स्थान जो मूल रूप से यात्रियों के लिए गेस्ट हाउस के रूप में सेवा प्रदान करते थे, उन्होंने चिकित्सा देखभाल की पेशकश करना शुरू कर दिया था, जो धीरे धीरे अस्पताल में बदल गए थे। महामारी के एक शताब्दी बाद, मध्य युग समाप्त हो गया, लेकिन इसने मानव जाति के लिए विकास के नए दरवाज़े खोले। लेकिन इस प्लेग के बिना, मानव जाति के इतिहास की कहानी पूरी तरह से अलग हो सकती थी।

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