Artificial Intelligence | अभिशाप या वरदान

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हम बहुत सी ऐसी फ़िल्में देखते हैं जिसमें तकनीक अपने एक अलग ही स्तर पर दिखाई देती है. हालाँकि इसमें से बहुत सी तकनीक केवल फ़िल्मों तक ही सीमित है. IronMan के जार्विस से लेकर Tao फ़िल्म के virtual assistant तक हमने बहुत सी तकनीक इन फंतासी फ़िल्मों में देखी है जो असली जीवन में संभव नहीं लगती. लेकिन अब समय आ गया है उन सब तकनीकों से रूबरू होने का जो हम केवल फ़िल्मों में देखा करते हैं और उसमें से एक तकनीक है कृत्रिम बुद्धिमता मतलब artificial intelligence.

कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब एक वास्तविकता बन चुकी है और यह हर जगह है। चाहे आपका मोबाइल हो, टीवी/TV हो, लैपटॉप हो, यह हर जगह है. सोचने वाली बात यह है कि यहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमें उस भविष्य के लिए मार्ग दिखा रही है जो हम हमेशा से चाहते आए हैं? या फिर ऐसा भी हो सकता है कि हम एक ऐसी तकनीक का निर्माण कर चुके हैं, जो हमारे ही विनाश का कारण बन सकती है.

Artificial Intelligence की तकनीक कैसे काम कर सकती है इसे एक उदाहरण से समझते हैं, मान लीजिए वैज्ञानिक कृत्रिम सुपर इंटैलिजेंस को एक आदेश देते है कि तब तक पेड़ों की संख्या बढ़ायी जाए जब तक कि वायुमंडल का संतुलन बहाल नहीं हो जाता. इस तरह का आदेश मिलने के बाद वैज्ञानिक कृत्रिम बुद्धिमता की मदद से मानव रहित स्थानों पर पेड़ लगाने का अपना काम शुरू करते हैं. और एक साल के बाद यह ऑपरेशन सफल होता है. नए जंगल दिखाई देने लगते हैं और हवा की गुणवत्ता बढ़ने लगती है. हालाँकि ये प्रयास चूँकि पूरी पृथ्वी पर नहीं किये गये थे इसलिए वायुमंडल में प्रदूषण से होने वाले नुक़सान को ठीक करने के लिए पर्याप्त नहीं है. और इस वजह से कृत्रिम सुपर इंटेलिजेंस एक तार्किक निष्कर्ष पर आता है की अपने मिशन को पूरा करने के लिए, उसे और अधिक पेड़ लगाए जाने चाहिए।

लेकिन इसमें कुछ बाधाएँ आ सकती है?

अगर हम सब कुछ इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर छोड़ते हैं तो यह है बुद्धिमत्ता बिना सोचे समझे अपने कार्यों को जारी रखने का निर्णय स्वयं करेगी और जिसकी वजह से मनुष्य सीधे प्रभावित होंगे. वृक्षारोपण का ही उदाहरण ले तो जैसे जैसे समय बीतता जाएगा, वृक्षारोपण बढ़ता जाएगा और नए जंगलों के बीच में छोटे गाँव ग़ायब होते जाएंगे. फिर धीरे धीरे शहर ग़ायब हो जाएंगे और हर तरफ़ पेड़ ही पेड़ दिखेंगे. कुछ शताब्दियों में वातावरण पूरी तरह से स्वस्थ होना शुरू कर देगा लेकिन इस समय तक इंसानों की मौजूदगी धरती पर रहेगी इसमें संशय हैं. जंगलों का इतनी तेज़ी से विस्तार हो सकता है कि हमारे गृह पर अलग अलग प्रजाति के जीवों को जीवित रहने के लिए शायद जगह नहीं मिले और वह अपने ही जगह से विलुप्त हो जाए.

मानवता का सर्वनाश करने में सक्षम एक मशीन किसी विज्ञान कि फ़िल्म की तरह लगती है, लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि हम इस तरीक़े की मशीन से ज़्यादा दूर नहीं है ? क्या artificial intelligence किसी इंसान के लिए ख़तरनाक हो सकती है, या फिर यह एक बड़ी आबादी को अपने नियंत्रण में ले सकती है ? शायद ऐसा न हो पाए क्योंकि ज़्यादातर artificial intelligence की मशीनें Level - 1 की है, जी हाँ बुद्धिमता यानी intelligence का भी वर्गीकरण किया हुआ है.

Level-1 एक संकीर्ण AI हो सकती है. यह सबसे सरल प्रकार की AI है. लेकिन सरल का मतलब बेकार नहीं है क्योंकि यह अपनी क्षमता से भी ज़्यादा एक साथ कई काम कर सकती है. जैसे की fast mathematics calculation या फिर विश्व शतरंज चैंपियन को हराना.

एक सामान्य AI, जिसका Level-2 है, वह एक इंसान के रूप में बुद्धिमान हो सकती है. यह एक व्यक्ति के रूप में एक ही क्षमता के साथ कई कार्य को पूरा कर सकती है, जिसमें अमूर्त सोच (abstract thinking) की क्षमता भी शामिल है, लेकिन ये कृत्रिम बुद्धि के लिए अभी कुछ असंभव सा है। लेकिन फिर भी यह एक ऐसी मशीन भी हो सकती है जो इस स्तर तक पहुँच गई है कि वे है ख़ुद को सुधारने की अविश्वसनीय क्षमता का उपयोग भी करेगी तो आने वाले समय में यह भी बहुत कम समय में विकसित होगी और इस तरह है कि मशीन Level-3 का हिस्सा होगी जिसे Artificial SuperIntelligence कहा जा सकता है. यह AI सबसे उन्नत स्तर की होगी और सबसे ख़तरनाक भी. आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि किस स्तर की शक्तियां इस तरह की मशीन में हो सकती है. इस तरह की ASI कुछ ही सेकंड में इंसानों की समस्याओं को हल कर सकती है या फिर ऐसा करने के लिए नई मशीनें भी बना सकती है. सब कुछ इस तकनीक की पहुँच के भीतर होगा यहाँ तक की हमारी प्रजातियों का अंत भी. और आज अगर देखा जाए तो Level-1 स्तर की AI हर जगह है.

उदाहरण के लिए, आपके सेलफ़ोन में AI एप्लीकेशन का एक छोटा समूह है , जब भी आप एक जीपीएस ऐप का उपयोग करते हैं, जैसे कि गूगल मैप्स का उपयोग करते हैं तब आप एवं कृत्रिम बुद्धिमता को सक्रिय कर रहे होते हैं जो आपको सबसे अच्छा मार्ग को खोजने में मदद करता है. ये केवल छोटे उदाहरण हैं जिनका हम हर समय उपयोग करते हैं। लेकिन ये छोटी मोबाइल एप्स इससे भी कहीं ज़्यादा कुछ कर सकती हैं.

एक और उदाहरण लेते हैं टेस्ला के वाहन का जो अपने दम पर ड्राइव कर सकता है. जैसा कि आम तौर पर आप और ड्राइवर की सीट पर एक ड्राइवर को देखते हैं लेकिन टेस्ला के वाहन में ड्राइवर की कोई ज़रूरत नहीं है यह ऐसे ही है जैसे सारे यात्री ही हो. आपको ब्रेक लगाने की भी ज़रूरत नहीं है क्योंकि यह काम ऑटोपायलट आराम से कर सकता है आपको जहाँ जाना है आप उस जगह के बारे में बताए या फिर उसे नक़्शे पर चिन्हित कीजिए, ऑटोपायलट नक़्शे की मदद से आपको वहाँ तक ले जाएगा. कार में कैमरे और अल्ट्रासोनिक सेंसर है जो की 360 डिग्री के भीतर हर चीज़ का पता लगा सकते हैं, जैसे कि अन्य वाहन, पैदल यात्री और यहाँ तक की सड़क पर कोई भी पढ़ी हुई वस्तु. इस तरह यह सुरक्षा के साथ शहर के माध्यम से ड्राइव करने के लिए इस जानकारी का उपयोग कर सकता है. इस वाहन में कई एप्लिकेशन है जो सरल कृत्रिम बुद्धि के माध्यम से वाहनों को संचालित करती है.

इसके अलावा भी हमारे पास दूसरे एप्स है जो कि कृत्रिम बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं, इनमें से कुछ इस प्रकार है Amazon Alexa,Google AssistantApple Siri

ये सब स्मार्ट होम ऐप्स में से एक है. ये इतने लोकप्रिय हो रहे हैं कि यह अनुमान लगाना कठिन है कि यह तकनीक आगे चलकर किस रूप में हमारे सामने होगी. यह इसी तरह से हैं जैसे कि कोई व्यक्ति भविष्य में 30 साल आगे की यात्रा पर निकला हुआ है. वह शायद ऐसा महसूस कर सकता है जैसे कि वह तीसरे ब्रह्माण्ड में हो. सोचने में थोड़ा अजीब है लेकिन हम अपने विकास का विश्लेषण करके उस निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं कि भविष्य में तकनीक किस तरह की हो सकती है.

जब मनुष्यों ने अंततः अधिक जटिल तरीके से संवाद करना सीख लिया, तो उनका एक दूसरे और दुनिया के साथ संबंध पूरी तरह से बदल गया. लेखन का अविष्कार होने के लिए कुछ परिवर्तन के साथ लगभग 50,000 साल लग गए. और इसके बाद जितने भी परिवर्तन हुए उसमें काफ़ी कम समय लगा जैसे प्रिंटिंग मशीन का आविष्कार, जिसकी वजह से दुनिया पूरी तरह से बदल गई. और कंप्यूटर के आविष्कार के साथ एक नई क्रांति में केवल 500 साल लगे. और 30 सालों से भी कम समय के बाद इंटरनेट ने एक बार फिर से इंसानों और दुनिया के साथ बातचीत करने के तरीक़े को बदल दिया. इनमें से किसी भी समाज का व्यक्ति और समाज के अगले चरण को नहीं समझ सकता जैसे अगर कोई प्रिंटिंग युद्ध में है तो वह उस युग में रहते हुए इंटरनेट को नहीं समझ पाएगा.

हर बदलाव के साथ इंसान की ज़िंदगी पूरी तरह से बदल जाती है, जिस तरह से इंसान जीते हैं और जिस तरह से वे काम करते हैं वह सब बदल जाता है. मानव विकास हर दिन बहुत तेज़ी से आ रहा है और कृत्रिम बुद्धि के साथ तो यह एक बहुत विशाल छलांग लगा रहा है. लेकिन यहाँ पर यह सोचने वाली बात है कि इंसान का ज्ञान उसकी सभ्यता के ऊपर ही निर्भर करता है. जितनी सभ्यता विकसित होती है उतनी ही तेज़ी से ज्ञान विकसित होता है.

लेकिन अगर हम मशीनों की बात करें तो मशीनें अपनी कृत्रिम बुद्धि को डेटाबेस में डेटा के अनुसार इस्तेमाल करती है. एक मशीन को इंसान की तरह सोचने में सक्षम बनाने के लिए उसमें प्रोसेसिंग शक्ति का होना ज़रूरी है. आज की दुनिया में सबसे शक्तिशाली मशीनें हैं सुपर कंप्यूटर. उनके पास एक विशाल डेटा स्टोरेज क्षमता है, जो कि उनकी प्रोसेसिंग शक्ति के साथ हमारे घरों के कम्प्यूटरों को संग्रहालय के टुकड़ों में भी बदल सकती है. इन सुपर कंप्यूटरों के पीछे सैकड़ों विशेषज्ञों का दिमाग़ होता है और नवीनतम तकनीकों का इस्तेमाल होता है. और यही कारण है कि इनको ज़्यादातर शोधों में इस्तेमाल किया जाता है जिसमें पर्यावरण, कॉस्मोलॉजि और यहाँ तक कि दवा के शोध भी शामिल है. लेकिन इतना सब होने के बाद भी सुपर कंप्यूटर को इंसानी दिमाग़ के जितना सक्षम बनाने के लिए दर्जनों गुना शक्ति की आवश्यकता होगी. आपको एक विचार देने के लिए, एक सुपर कंप्यूटर दो टेनिस कोर्ट की जगह घेरता है और इसे संचालित करने के लिए 24 मिलियन वॉट की आवश्यकता होती है. फिर भी यह मानव दिमाग़ की तुलना में कम कुशल है जिसे केवल 20 वॉट की आवश्यकता होती है. हमारा दिमाग़ सबसे शक्तिशाली और जटिल मशीनों में से एक है. एक मानव मस्तिष्क के एक मिली मीटर जगह के अंदर इतने छोटे सर्किट है कि यह समझना अभी भी मुश्किल है कि वे सभी एक दूसरे के साथ कैसे बातचीत करते होंगे. प्रत्येक न्यूरॉन के माध्यम से 10000 अन्य न्यूरॉन्स जुड़ सकते हैं. हमारे दिमाग़ में इतने न्यूरॉन होते हैं कि अगर हम क़रीब से देखिए, तो वे किसी तरह के क़ालीन की तरह दिखते हैं जो इतना मोटा होता है कि इसे देखना लगभग असंभव लगता है.

इन्सान के समाज में विज्ञान तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी हमें काफ़ी सुधार की ज़रूरत है जैसे इमेज कैप्चर टेक्नोलॉजी के अंदर हमें काफ़ी सुधार की ज़रूरत है. अन्यथा मानव शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग प्रकृति की सबसे बड़ी गतिविधियों में से एक के रूप में रहेगा. लेकिन बुद्धिमता का मतलब केवल प्रोसेसिंग पावर नहीं है. हालाँकि कृत्रिम बुद्धिमता में जितना चाहे विकास हो जाए लेकिन खाने का स्वाद लेना और संगीत का आनंद लेना फिर भी एक चुनौती रहेगी. लेकिन हो सकता है कि यह चुनौती भी ज़्यादा समय तक ना रहे, क्योंकि जिस तरह से दूसरी चीज़ें मशीनों को सिखायी जा रही है वैसे ही मशीनों को यह भी सिखाया जा सकेगा कि कैसे संगीत का आनंद लेना है और भोजन का स्वाद लेना है. मशीनों को इसे वैसे ही समझना होगा जैसे कि इंसान समझते हैं और करते हैं.

लेकिन क्या आज हम कितना आगे आ चुके हैं कि हमारे वर्चुअल असिस्टेंट हमारी आवाज़ से हमें पहचान सके यहाँ से हमारी शक्ल देकर हमें पहचान सके. यहाँ हमें कुछ समझना पड़ेगा कि जिस तरह से इंसान एक दूसरे इंसान की शक्ल देख उसे पहचानता है एक मशीन ऐसा नहीं करती है. एक मशीन के रूप में Artificial Intelligence दुनिया को एक अलग तरीक़े से समझती है. उसके पास तारो वाले आकाश को देखने या फिर चेहरे पर हवा को महसूस करने की क्षमता नहीं है. और वास्तव में इसके पास कोई चेहरा भी नहीं है. प्रकाश और आयामों की अवधारणा, इसके लिए कोई मायने नहीं रखती. इसकी प्रोसेसिंग बाइनरी तरीक़े से काम करती है यहाँ पर सब हाँ और नही या TRUE और FALSE के नीचे आता है. जैसे काला या सफ़ेद और शून्य और एक. दुनिया को इस तरह से समझना बेहद कठिन है लेकिन AI ऐसा करती है और तभी वो इंसानों से ज़्यादा बुद्धिमान है.

उदाहरण के लिए आप कोई भी तस्वीर ले सकते हैं. चेहरे की पहचान करने वाले सॉफ़्टवेयर को यह पता लगाने के लिए कि यह चेहरा किस से संबंधित है, वह सबसे पहले पिक्सल का विश्लेषण करता है जो कि एक डिजिटल छवियों की सबसे छोटी इकाई है. क्योंकि यह एक उच्च रिज़ॉल्यूशन की छवि है, इसलिए इसमें आठ मिलियन से अधिक पिक्सल है. उसके बाद उन में से प्रत्येक को नज़दीक के पिक्सल से सम्बंधित करने के लिए आँखों और मुँह जैसे विभागों तक पहुँचाने का प्रयास किया जाता है. तब ही कृत्रिम बुद्धिमता का एल्गोरिद्म चेहरे से अड़सठ से अधिक महत्वपूर्ण जानकारी निकाल पाता है जैसे आँखों और आँखों के बीच का त्रिकोण या दूरी या फिर माथे और आँखों के बीच की दूरी, और उसके लिए यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक हस्ताक्षर बनाती है जो कि हर व्यक्ति के लिए अलग होता है. अंत में यही हस्ताक्षर वह अपने डेटाबेस में सैकड़ों हज़ारों लोगों की छवियों के साथ मिलाना करती है और तब तक यह विश्लेषण चलता है जब तक कि उच्चतम स्तर के सटीक व्यक्ति के चेहरे के साथ एक परिपूर्ण मैच नहीं होता है. और जैसे ही वह मैच होता है उसके सामने वाला नाम कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपयोग करना शुरू कर देती है क्योंकि वह है अब उस इंसान को उसी नाम से पहचानेगी.

इसे सरलता से समझने के लिए, यह कुछ ऐसा है जो इनसान लगभग अपने आप कर सकते हैं. लेकिन जब एक AI इसे करने की कोशिश करती है तब वह बहुत सारे पैटर्न के साथ उस चेहरे का मिलान करती है और यह पैटर्न और डेटाबेस काफ़ी बड़ा हो सकता है. लेकिन इस बारे में ऐसे सच्चे की दुनिया को इतने सीमित तरीक़े से देखने पर कुछ भी सीखना कितना कठिन होगा. क्या ये कठिनाई कृत्रिम बुद्धिमता के लिए भी है? शायद नहीं क्योंकि एक मशीन के सोचने का मतलब प्रोसेसिंग करना होता है. और इस प्रोसेसिंग को दूसरी मशीनों की सहायता से बढ़ाया जा सकता है.

तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि रोबोट अमर है?

इस तरह का रोबोट हमने एक फ़िल्म में देखा था जिसका नाम था Bicentennial man. फ़िल्म में जिस इंसान को दिखाया गया है वह लड़का पूरी तरह से एक कृत्रिम बुद्धि द्वारा बनाया गया था. लेकिन यह कैसे किया ? आइए देखते हैं, इस चित्र में दिखने वाला लड़का पूरी तरह से एक कृत्रिम बुद्धि द्वारा बनाया गया है, यहाँ पर एक ड्राफ्ट्समैन अलग अलग चेहरों को समझना चाहता है. और ऐसा करने के लिए वह मशहूर हस्तियों की तस्वीरों का अध्ययन करके शुरुआत करता है. और समय समय पर वह एक विशेषज्ञ को अपनी रिसर्च जाँचने के लिए अपने बनाए हुए चित्र और उस चित्र के असली चित्र भी साथ में भेजता है. उस विशेषज्ञ का कार्य यह पहचानना है कि कौन सी शक्लें असली है और कौन सी नक़ली है. धीरे धीरे ड्राफ्ट्समैन की तकनीक में इतना सुधार आता कि वह एकदम वैसा ही चित्र बनाने लग जाता है जो कि असली फ़ोटो में बना हुआ है. और इस समय वह ड्राफ्ट्समैन शक्लों की बारी किया समझ चुका है और वह यह सीख चुका है कि कैसे सटीक विश्लेषण करना है. कुछ इसी तरह से मशीनें भी काम करती है, वह सीखती है जिनको इंसान जाँचते हैं कुछ भी ग़लत होने पर वह मशीन के अंदर उस गलती को सुधारते हैं लेकिन यह प्रक्रिया काफ़ी तेज़ गति से होती है. दूसरे शब्दों में इसे न्यूरल नेटवर्क कहा जाता है जहाँ पर मशीन है एक बिंदु से सीखते हुए उसके साथ वाले बिंदुओं को जाँचती है और फिर सीखती है. इस तरह से मशीनों को पता रहता है कि मुँह के ऊपर नाक है और नाक के ऊपर दो आँखें है. इस तरह से कृत्रिम बुद्धिमता एक ऐसा चेहरा भी बना सकती है जिसका कोई अस्तित्व नहीं है.

बाइसेन्टेनियल मैन ने मशीन लर्निंग को और भी बेहतर बनाने के लिए एक बहुत ही कुशल समाधान का उल्लेख किया।

यह अच्छा दिखने वाला लड़का पूरी तरह से एक कृत्रिम बुद्धि द्वारा बनाया गया था। लेकिन यह कैसे किया? आइए दिखाते हैं कि एक ड्राफ्ट्समैन फोटो यथार्थवाद सीखना चाहता है। वह पूरी तरह से नया चेहरा बनाने के लिए मशहूर हस्तियों की तस्वीरों का अध्ययन करके शुरू करता है। और समय-समय पर वह एक विशेषज्ञ की जाँच के लिए ईमेल द्वारा अपने चित्र भेजता है। लेकिन इन ईमेलों में, कलाकार इस रचना के साथ वास्तविक चित्र भी भेजता है। विशेषज्ञ का कार्य यह पहचानना है कि कौन से चित्र हैं और कौन से चित्र हैं। यदि वह चित्र से किसी चित्र को अलग नहीं कर सकता है, तो इससे ड्राफ्ट्समैन को अपनी तकनीक में इतना सुधार आता है कि वह विषय पर एक विशेषज्ञ को धोखा दे सकता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, इलस्ट्रेटर विशेषज्ञ से अधिक से अधिक प्रतिक्रिया इकट्ठा करता है, जिससे उसे इस चित्र को सुधारने में मदद मिलती है। ड्राफ्ट्समैन ने अपनी तकनीक (illustrator software) और विशेषज्ञ को समझा दिया, यह समझने के बाद कि इलस्ट्रेटर उस यथार्थवादी कला को कैसे बना सकता है, यह सीखा कि कैसे सही सटीक विश्लेषण करना है। इस सादृश्य में, वे दोनों एक चक्र में एक साथ काम करने और सीखने वाली मशीनें हैं जो बहुत तेज़ गति से होती हैं। इसे न्यूरल नेटवर्क कहा जाता है। और यह कि हमारे उदाहरण से he उस यथार्थवादी चेहरे को बनाने के लिए हो को सीखा। इस विकास की गति प्रत्येक दिन बढ़ जाती है।

कृत्रिम बुद्धिमता द्वारा बनाए गए चित्रों को आप यहाँ देख सकते हैं. तो इस विकास की गति हुई यह संभव है कि दो दशकों में एक बुद्धिमान तंत्र अपने आस पास के क्षेत्र को समझने में सक्षम होगा, इसे पता होगा कि गुरुत्वाकर्षण क्या है, यह शायद प्रकाश को भी महसूस करें और यह शायद अंधकार को भी और शायद वह यह भी बताएँ कि क्या हमारे वातावरण से संबंधित है और क्या नहीं. और इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि यह कृत्रिम बुद्धिमता वास्तविकता को भी इसी तरह से समझें कि जैसे हम इंसान समझते है. और इस प्रकार यह कृत्रिम बुद्धिमता Level-2 पर आ जाती है.

अभी तक हमने जितने उदाहरणों को देखा है वे सभी स्तर एक यानी लेवल वन कृत्रिम बुद्धिमता है. लेकिन आज ये हर दिन तेज़ी से विकसित हो रहे हैं. ये कृत्रिम बुद्धिमता सड़कों पर भी अपना आभास करवा रही है, और वह भी काफ़ी प्रभावशाली तरीक़े से. इन मशीनों ने जटिल अवधारणाओं को समझना और समझने के बाद निर्णय लेना भी शुरू कर दिया है. जिन समस्याओं को मानव नहीं समझ पाते हैं उनको समझने के लिए कृत्रिम बुद्धिमता की सहायता ली जा रही है. लेकिन अभी भी यह मशीनें अपने आप ज़्यादा कुछ नहीं सीखा पाती. लेकिन बहुत जल्द ही यह भी संभव हो पाएगा, उदाहरण के लिए इंटरनेट के माध्यम से, यह लगभग हर फ़िल्म, गीत , पुस्तक और वैज्ञानिक लेख तक इन मशीनों की पहुँच होगी. और एक स्पंज की तरह, यह कृत्रिम बुद्धि एक आश्चर्यजनक गति में उस सभी ज्ञान को अवशोषित करेगी, और इसका नया विकास और भी तेज़ी से होगा.

उदाहरण के लिए, यदि पहले सुधार के चरण में एक साल लगता है, तो दूसरे में संभवतः छह महीने, तीसरे में केवल एक सप्ताह तक का समय लगेगा, यह तब तक चलेगा जब तक कि हम एक बिंदु तक नहीं पहुंचते हैं जहां नया विकास लगभग तुरंत होगा। इसलिए कृत्रिम बुद्धि बहुत लंबे समय के लिए Level-2 पर अटका नहीं होगा।

इसे एक बुद्धिमान लिफ्ट के उदाहरण से समझते हैं, हम ऐसा मानते हैं की प्रत्येक मंजिल एक खुफिया स्तर का प्रतिनिधित्व करता है, और जैसे जैसे लिफ्ट ऊपर बढ़ती जाती है बुद्धिमता का स्तर भी बढ़ता जाता है । एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का ज्ञान जो स्तर दो तक पहुँचता है, इतनी तेज़ी से बढ़ता है कि कुछ ही समय में इसकी क्षमता अकल्पनीय रूप से हम मनुष्यों तक पहुँच सकती है। और तब यह एक कृत्रिम सुपर इंटेलिजेंस बन जाएगा। आज यह अनुमान लगाना लगभग असंभव होगा कि एक सुपर इंटेलिजेंस अपनी शक्तियों के साथ क्या क्या कर सकता है। लेकिन ऐसा सोचा जा सकता है कि अगर मानव सुपर इंटेलिजेंस के लिए कुछ ख़तरा बना तो सुपर इंटेलिजेंस अपने आप कुछ मशीनें भी बना सकती है ताकि मानव निर्मित ख़तरे को कम किया जा सके.

जहाँ एक तरफ़ कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानों के आदेश का पालन करती है वहीं दूसरी तरफ़ यही कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानों के आदेश का पालन करते हुए इंसानों का नुक़सान भी कर सकती है. लेकिन फिर भी सोचा जाए यदि एक सुपर इंटेलिजेंस इंसानों के ख़िलाफ़ हो जाती है तो शायद सिर्फ़ एक सरल कारण की वजह से ऐसा मुमकिन नहीं होगा. और वह यह है कि आधुनिक मशीनें अच्छे और बुरे की अवधारणा को नहीं समझती है. लेकिन साथ में इंसानों को यह भी सोचने की ज़रूरत है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ काम करने से पहले एक सुरक्षित माहौल बनाना पड़ेगा. और हमें यह काम तेज़ी से करना पड़ेगा क्योंकि इंसानों के साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी सोचने का काम कर सकती है.

लेकिन जब सुपर इंटेलिजेंस का विकास होने की शुरुआत होगी तब शायद इंसानों के लिए सब कुछ अच्छा ही होना चाहिए. यह हमारे इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा. यह कई वर्षों से मानव जीवन की उम्मीद को भी बढ़ा सकता है. और यह तो हमें मानना ही पड़ेगा कि आज कल कृत्रिम बुद्धि पहले से ही कुछ चीज़ें ऐसी कर सकते हैं जो कुछ साल पहले तक केवल चमत्कार थे. जैसे कि गूगल मैप्स. आप ख़ुद सोचिए कि इस तरह की तकनीक से कितने लोगों के जीवन में बदलाव आया और कितने लोगों को रोज़गार भी मिला. एक जीवंत उदाहरण देते हैं जिसमें इस महिला के साथ एक हादसा हुआ था और वह एक दशक से भी अधिक समय से हथियार चलाने में असमर्थ रही थी. लेकिन आज वह अपने विचारों का उपयोग करके पानी की बोतल भी उठा सकती है और आप देखें कि 15 सालों के बाद यह महिला कितनी ख़ुश हैं. कमाल है न

लेकिन यह काम कैसे करता है. तो यह जितना जटिल दिखता है उतना है नहीं. एक एस्पिरिन की गोली के आकार की छोटी chip जिसे रोगी के मोटर कोर्टेक्स के अंदर प्रत्यारोपित किया जाता है. यह मस्तिष्क कहा वह हिस्सा होता है जो इंसान के शरीर को नियंत्रित कर सकता है. मस्तिष्क वास्तव में जटिल है लेकिन यह हिस्सा जिसे हम मोटर कोर्टेक्स कहते हैं, इसे समझना इतना मुश्किल काम नहीं है और वैज्ञानिकों ने इस हिस्से को इस हद तक समझ लिया है कि वह यह है बता सकते हैं कि इस हिस्से का कौन सा क्षेत्र क्या नियंत्रित कर सकता है. यह छोटी chip मस्तिष्क के इस हिस्से से विद्युत आवेगों को पकड़ती है और एक कृत्रिम बुद्धि इन आवेगों की व्याख्या करती है या यूँ कह लीजिए, इन सिग्नल्स को कमांड में बदलती है.

और अंत में एक कंप्यूटर इन सारी कमांड को चलाता है. इसमें एक रोबोट प्रोस्थेटिक अंग हो सकता है, जैसे कि पैर, जो की उन लोगों के लिए हो सकते हैं जो अपने पैरों का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं, लेकिन इस तकनीक से वह फिर से चल सकते हैं. वैसे अभी तो यह शुरुआत है और हमें और भी आगे जाने की ज़रूरत है. जैसा कि बहुत से वैज्ञानिक सोचते हैं कि जब किसी इंसान की मृत्यु हो जाती है तब उसके सारे अंग सही समय पर किसी और ज़रूरतमंद इंसानों के काम आ सकते हैं. यह इसी तरह से हैं जैसे कि एक कार की उम्र हो सकती है लेकिन अगर आप इसकी भागों को बदलते हैं तो यह बहुत लंबे समय तक चल सकती है. और हम इंसानों के साथ ऐसा हो सकता है.

पुरानी कहानियों में हमने बहुत सी कहानियां पढ़ी है जिसमें इंसानों के अमर होने की कहानियाँ है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण इंसानों का अमरता प्राप्त करना भी संभव नज़र आता है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता इतनी आम बात हो गई है कि कब हम इसका इस्तेमाल करते हैं और कब हम इसका इस्तेमाल नहीं करते यह हमें पता भी नहीं चलता. लेकिन जो चीज़ उत्साहित करती है वह यह है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की वजह से हम एक महान होने के किनारे पर खड़े है. और इस क्रांति का सबसे ज़्यादा फ़ायदा चिकित्सा और अंतरिक्ष रिसर्च में हो सकता है. जैसे जलवायु परिवर्तन, भोजन और पीने के पानी की कमी को दूर करना आदि. लेकिन दूसरी ओर देखा जाए तो यह हमारे विकास में एक ख़तरनाक क़दम भी हो सकता है. क्या वास्तव में एक उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता अपने निर्माता की कमज़ोरी को पहचान सकती है? कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बारे में कोई भी यह सुनिश्चित नहीं कर सकता. और जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात आती है तो हम ये नहीं बता सकते कि आगे क्या होने वाला है?

मेरा मानना ​​है कि हम मानवता की प्रगति में एक महान क्रांति के किनारे पर खड़े हैं। और जल्द ही हम एक ऐसी दुनिया में रहेंगे, जो हमारी आज की दुनिया से बिलकुल ही अलग होगी। लेकिन यदि यह तकनीक की छलांग इंसानों के लिए बहुत ज़रूरी है सबसे बड़ा सवाल ये हैं कि हमारा समाज इस विकास के साथ कैसे आगे बढ़ेगा ?

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