पृथ्वी पर कुत्ते कहाँ से आए?

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इन्सान और कुत्ते हमारी धरती ग्रह पर सबसे ईमानदार दोस्ती करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे ईमानदार दोस्तों की उत्पत्ति कैसे हुई ? क्या यह जानने का कोई तरीक़ा है कि किस तरह से ये दोस्ती शुरू हुई ? और इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि दो अलग अलग जातियों के विकास को इस दोस्ती ने कैसे प्रभावित किया ?

आइए देखते हैं कि किस तरह से भेड़ियों की प्रजाति कुत्तों में बदली.

331 ईसा पूर्व में, सिकंदर महान, जो कि उस समय के महानतम विजेताओं में से एक थे, जिन्होने फारसी सेना के खिलाफ निर्णायक लड़ाई में 50,000 मेसिडोनियन सैनिकों का नेतृत्व किया था।

इसी सिलसिले में बात करते हैं गौगामेला के युद्ध की जो 331 ई.पू. में हुआ था.

गोगामेला की लड़ाई अलेक्जेंडर के जीवन की सबसे कठिन और रक्तपात पूर्ण लड़ाई में से एक थी, क्योंकि फ़ारसी सेना मैसेडोनियन सेनाओं से लगभग दोगुनी थी। युद्ध में मामला बद से बदतर होता जा रहा था, इसे युद्ध के बारे में कहा जाता है की लड़ाई के दौरान, सिकंदर पर एक विशाल शत्रु हाथी ने हमला किया था।

उस समय सिकंदर के पास बचाव का कोई साधन और मौक़ा नहीं था और वह भाग नहीं सकता था और किसी भी क्षण वह उस हाथी के द्वारा कुचला जा सकता था. ऐसा लग रहा था कि सिकंदर की मौत कभी भी हो सकती थी. लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको हैरत में डाल दिया, सिकंदर के एक दोस्त ने जब सिकंदर को मुसीबत में देखा, तो फ़ौरन मोर्चा सँभाला . हैं और वह दोस्त कोई और नहीं सिकंदर का पालतू शिकारी कुत्ता Peritas था, Peritas ने हाथी के ऊपर हमला किया, और अपने नुकीले दाँत हाथी की सूँड़ में गड़ा दिए जिससे हाथी घबरा गया और सिकंदर को भागने का मौक़ा मिल गया. लेकिन Peritas अपने आप को उस हाथी के हमले से नहीं बचा सका और कुछ समय बाद वह उस हाथी से लड़ते हुए मारा गया. और इस तरह से इस बहादुर कुत्ते ने सिकंदर की रक्षा के लिए वीरता का उदाहरण पेश किया और अपनी जान की परवाह किए बिना अपने मालिक की सुरक्षा के लिए उस हाथी से भिड़ गया. लड़ाई के अंत में फ़ारसी साम्राज्य पराजित हुआ और इस ने इस प्राचीन काल में सबसे महान साम्राज्यों में से एक की स्थापना के लिए सिकंदर के लिए दरवाज़े भी खोले.

मैसेडोनियन साम्राज्य

दुनिया को जानने के लिए सिकंदर ने एक नए तरीक़े की सोच बनायी जिसमें उसने ग्रीक और पूर्वी संस्कृतियों को एकजुट किया था. लेकिन ऐसा भी हो सकता था की ये संस्कृतियां एकजुट न हो पाती, क्योंकि अगर Peritas नहीं होता तो शायद सिकंदर भी नहीं होता. Peritas के बिना हमारी संस्कृति आज की संस्कृति से काफ़ी अलग हो सकती थी.

तो क्या यह सच है कि जिस संस्कृति को आज हम जी रहे हैं उस संस्कृति में एक कुत्ते का योगदान भी है? अगर आपके पास भी यही प्रश्न है तो इसका जवाब हाँ है.

आपने ये बहुत बार ग़ौर किया होगा कि जब जब आपने अपने अपने दोस्त, जिसका पालतू कुत्ता उसके आस पास हो, को हाथ लगाया या फिर उससे ज़ोर से चिल्लाकर बात की या फिर आपने उसको मारने के लिए अपना हाथ उठाया तब उसी क्षण हो सकता है कि आपके दोस्त का पालतू कुत्ता या तो आपके ऊपर भौंके या फिर आप को काटने के लिए दौड़े. ऐसा अक्सर होता है, और इसमें उस कुत्ते की कोई गलती नहीं होती है क्योंकि यह कुत्तों का स्वभाव है और यह स्वभाव कुत्तों को भेड़ियों से विरासत में मिला है.

लेकिन अब आप यह सोच रहे होंगे कि अगर कुत्तों के पूर्वज भेड़िए थे तो फिर यह कुत्ते भेड़ियों से अलग क्यों दिखते हैं? इसका सीधा और सरल जवाब है, विकास जो की अपनी एक गति से आगे बढ़ा और जिसने भेड़ियों को कुत्तों में धीरे धीरे बदल दिया, हालाँकि इसमें धरती के सारे भेड़िए कुत्तों में नहीं विकसित हुए. अगर आप पुराने पुराने मनुष्यों को देखेंगे तब आपको समझ आएगा कि उस समय के मानव और आज के मानव में क्या भिन्नता है? तो आज के कुत्तों को उनका ज़्यादातर स्वभाव भेड़ियों से विरासत में मिला है. लेकिन इस स्वभाव के पीछे एक समझौता छुपा है जो की प्रागैतिहासिक इंसानों और भेड़ियों के बीच में हुआ था.

15,000 साल पहले, पृथ्वी लगभग वैसी ही थी जैसी कि आज है. अगर आज भी कोई उस समय में जंगली जानवरों के बारे में या फिर जंगलों के बारे में पता लगाना चाहे तो उन्हें लगभग वही पाते हैं और जानवर मिलेंगे जिनका अस्तित्व आज भी है. लेकिन वह समय हैं अधिकांश प्रजातियों के लिए बहुत ही ख़तरनाक था जिनमें भेड़िये भी थे, और जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए रोज़ एक संघर्ष करते थे. उन्हें भोजन के लिए लड़ना पड़ता था और अपने से ताक़तवर शिकारियों से भी लड़ना पड़ता था और हम को डराने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ता था. क्यों की प्रकृति का नियम काफ़ी स्पष्ट है, हमेशा ताक़तवर ही अस्तित्व में रहता है और एक साधारण गलती से भी आपकी जान जा सकती है. विलुप्त होने का डर और मौत की हताशा का संघर्ष और उसका अनुभव मनुष्यों द्वारा भी किया गया था, जो उस समय दुनिया भर में अपनी छाप छोड़ना शुरू कर रहे थे. उस समय मनुष्य शिकारी होते थे और भोजन इकट्ठा करने वाले होते थे. वे छोटे समूह में रहते थे और जगह जगह पलायन करते रहते थे, भोजन की तलाश करते रहते थे, जलवायु संबंधी बाधाओं से भी बचना उनके दैनिक संघर्ष का एक हिस्सा था और शिकारियों को भी चकमा देते थे. हालाँकि मनुष्यों के पास एक विशेषता थी जो किसी अन्य जानवर के पास नहीं थी, मनुष्यों के पास संसाधन थे. उस समय तक मधेशियों को कृषि तकनीकों में महारत हासिल नहीं थी लेकिन यह एक ऐसे जानवरों की पड़ जाती थी जो अपने स्वयं के भोजन की खेती करने में धीरे धीरे सक्षम होने लगी थी जिसमें यह प्रकृति का सहयोग लेते थे. और इस वजह से धीरे धीरे इंसानों के जीने का तरीक़ा पूरी तरह से बदल रहा था. अब भोजन के लिए हैं पृथ्वी पर चारों ओर घूमना आवश्यक नहीं रह गया था.

धीरे धीरे आदि मानव ने अपने गाँव का निर्माण करना शुरू किया और इस वजह से उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया. लेकिन केवल उन्हीं का जीवन नहीं बदला बल्कि उनके आस पास की अनेक प्रजातियां का भी जीवन इन आदिमानव के अनुकूल हो गया. उस समय इन्सान पौधे भी लगाते थे और शिकार भी करते थे. और इस वजह से उनका सामना लगभग रोज़ अलग अलग प्रजातियों से होता था. और इन्हीं में से एक प्रजाति थी जिसे भेड़िया कहा जाता था.

ऐसा भी कहा जाता है कि आदिमानव से पहले भेड़िया प्रजाति नहीं इंसानों पर हमला किया था.

जब इंसानों और भेडियों का सामना पहली बार हुआ था उसी समय यह स्पष्ट हो गया था कि कौन ताक़तवर है. मैं इंसानों की ही बात कर रहा हूँ. हालाँकि भेड़िए काफ़ी शातिर थे और उन्हें यह स्पष्ट था कि सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही बुद्धिमानी है. लेकिन मनुष्यों के पासे क्षमता थी बहती हथियार बनाने की क्षमता और जिसकी वजह से वह अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकते थे. मनुष्य पहले से ही दुनिया में सबसे ख़तरनाक प्रजातियों में से एक थे. क्योंकि इनके लिए बड़े और मज़बूत प्राणियों का सामना करना कोई समस्या नहीं थी और न ही ये डर कर भाग जाते थे. लेकिन जब जब इनका सामना भेड़ियों से हुआ इन्होंने उन भेड़ियों को मारना शुरू कर दिया और जिस वजह से भेड़ियों के सामने अधिक ख़तरा प्रस्तुत हुआ. मनुष्य ज़्यादा शातिर और आक्रामक थे. बहुत से ऐसे भेड़िए थे जो की आक्रामक थे और जिन्हें मनुष्यों ने मार दिया था. बाक़ी जो बच गए हैं उनके सामने मनुष्यों की उपस्थिति को सहन करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था. जब भेड़ियों ने देखा कि उनके समूह के बड़े बड़े शिकारियों को मनुष्यों ने मार दिया और जिसकी वजह से उनके पास भोजन करने के साधन भी ख़त्म हो गए, तब उन्होंने गांवों की तरफ़ प्रस्थान किया और मनुष्यों के साथ एक तरह की संधि विकसित की.

लेकिन सवाल यह उठता है कि इतने भेड़ियों के मारे जाने के बाद जो बचे हुए भेड़िए थे क्या इंसानों से नहीं डरते थे ?

यह सवाल इसलिए भी आया क्योंकि आज जितनी भी कुत्तों की प्रजातियां है उसमें से जितनी भी आक्रामक प्रजातियाँ हैं वे इंसानों से डरती भी है और इसलिए उनका कहना भी मानती हैं.

लेकिन क्या आपको पता है कि अधिकांश प्रजातियों के लिए डर एक आवश्यक अस्तित्व का उपकरण है, डर का मतलब यह नहीं है कि आप कायर हैं इसका मतलब ये हैं कि आपके आस पास कोई ख़तरा है जिसका सामना आपको नहीं करना है और वहाँ से चले जाना है.

तो चलिए चलते हैं Shy Wolf Sanctuary जो की Naples, Florida में स्थित है. यहाँ पर जंगली जानवरों का रख रखाव किया जाता है जिसमें मुख्यतः भेड़िया भी शामिल हैं.

जब भी भेड़िए इंसानों के संपर्क में आते हैं यह इंसानों के आस पास होते हैं तो उसमें एक डर होता है जो स्वाभाविक है. उस समय उनके stress हारमोन उच्च स्तर पर होते हैं. और इसी हारमोन की वजह से वह लोगों से संपर्क करने से डरते हैं. उनके लिए यह बहुत बड़ा जोखिम है. लेकिन कुछ शोधकर्ताओं का ऐसा मानना है कि प्रागैतिहासिक भेड़ियों में एक जेनेटिक परिवर्तन आया जिसने उनके उस hormone की मात्रा को कम कर दिया. और इसका नतीजा यह हुआ कि वह है मनुष्यों से कम डरने लगे हैं, और इससे उनको और इंसानों को अपने रिश्तों को हमेशा के लिए बदलने में मदद मिली.

इस बदलाव के लिए प्रकृति को एक धन्यवाद देना चाहिए और इसी वजह से आज इस wolf century में आप मोहन नाम के भेड़िये से मिल सकते हैं, मोहन के पूर्वज उन भेड़ियों में से थे जिन्होंने सबसे पहले गाँवो से संपर्क किया था. लेकिन यह एक प्रागैतिहासिक भेड़िया नहीं है. मोहन को अन्य जानवरो के साथ जंगल से बचाया गया और इस अभयारण्य में सुरक्षित रखा गया. मोहन की तरह ही ऐसे बहुत से भेड़िये हैं जिनकी एक ही कहानी है. इनमें से बहुत से ऐसे भी हैं जिनको उनके मालिकों ने छोड़ दिया था.

जी हाँ ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो भेड़ियों को यह सोचकर पालने की कोशिश करते हैं कि वह कुत्तों की तरह व्यवहार करेंगे. और जब ऐसा नहीं होता, और जब उनको लगता है कि वह एक जंगली जानवरों को घर ले आए हैं तो वह उसे छोड़ देते हैं. मोहन जैसे जानवरों के साथ यह गलती बहुत आम है क्योंकि वह भेड़िया भी है और कुत्ता भी है, या फिर इसे हम बोल सकते हैं wolfdog. Wolfdog घरेलू कुत्तों के साथ Cross-breeding का परिणाम होते हैं. और मोहन के मामले में हम तीन कुत्तों की नस्लों का उल्लेख कर सकते हैं. इनमें है - German ShepherdAlaskan Malamute, और Siberian Husky

लेकिन उनका अधिकांश DNA एक Gray Wolf का है, जो निश्चित रूप से उनके आकार, उपस्थिति और उनकी प्रवृत्ति में एक निर्धारित कारक है। लेकिन जब यह नस्लें आपसे संपर्क करती है तो वह वहीं करती हैं जो उन भेड़ियों ने किया था जब वे प्रागैतिहासिक गाँव से संपर्क करते थे. इनको मनुष्यों की आवाजें, और विशेष रूप से इंसानों द्वारा छोड़े गए भोजन आकर्षित करते थे. और इसी जिज्ञासा से प्रेरित होकर कम आक्रामक भेड़ियों ने धीरे-धीरे गांवों से संपर्क किया और चूंकि वे आक्रामक नहीं थे, वे लोगों में घुलने मिलने लगे हैं और इंसानों ने भी उन को नहीं मारा. समय के साथ यह निकटता एक साझेदारी बन गई, और मोहन जैसे जानवर इंसानों के जीवन का हिस्सा बन गए. इसके साथ ही हमें यह भी पता होना चाहिए कि Wolf-packs क्या होते हैं, ये हैं भेड़ियों का एक समूह हो सकता है जो अपने नियमों का पालन करते हुए अपने समूह का अस्तित्व बचाने के लिए काम करते है. इनके लिए समूह का अस्तित्व बहुत अधिक महत्वपूर्ण है.

और यही वह कारण है कि ये भेड़िए जानते हैं कि इंसानों के बिना बड़े शिकारियों से लड़ना लगभग असंभव होगा. और इसी कारण की वजह से वे इंसानों के पास गए और एक नई प्रजाति बनी जिसे इंसानों के साथ रहने में कोई आपत्ति नहीं थी.

और इस वजह से आज कुत्ते इंसानों के best friend के रूप में जाने जाते है , या यूँ कह लीजिए कि औरतों के best friend जाने जाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि महिलाओं ने canids, मतलब, कुत्तों के परिवार से संबंध रखने वाले जानवरों और इंसानों के बीच की दोस्ती को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

प्रागैतिहासिक काल में इंसान अपने कामों को आपस में बाँट लेते थे जिसमें पुरुष शिकार करने के लिए बाहर निकल जाते थे, जबकि महिलाएँ भोजन इकट्ठा करने के लिए बस्ती के क़रीब रहती थी. तो सही मायनों में वे महिलाएँ भी थीं जिन्होंने जानवरों को अपनाया था और शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया है कि कई बार भेड़ियों को महिलाओं द्वारा स्तनपान भी करवाया गया था.

लेकिन यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि महिलाएँ जानवरों को स्तनपान क्यों करवाएगी ? लेकिन ऐसा बहुत बार देखने में आया है, जब एक नस्ल की मादा ने दूसरे नस्ल के शिशुओं को स्तनपान करवाया है. दूसरी शताब्दी में ख़ासकर जब महिलाओं ने कारखानों में काम करने की शुरुआत की तब उसमें से बहुत सी महिलाओं के बच्चे सीधे तौर पर गाय के दूध के ऊपर निर्भर रहते थे. ऐसा माना जाता है की एक प्रजाति के बच्चे को दूसरी प्रजाति कि मादा के द्वारा दूध पिलाना आदर्श नहीं है लेकिन प्रागैतिहासिक महिलाओं ने इसकी ज़्यादा चिंता नहीं की.

वह भेड़ियों के शावकों से डरते नहीं थे, क्योंकि वे गांवों के क़रीब जाने पर आक्रामकता नहीं दिखाते थे और इसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि वह भेड़िए नहीं बल्कि उनके बच्चे थे.

गोल सिर, बड़ी आंखें और छोटे जबड़े के साथ शावक की उपस्थिति, वयस्क जानवरों के भीतर स्नेह और सुरक्षा की भावना जागृत करती है, और यह किसी दुर्घटना की वजह से नहीं था। वास्तव में, यह एक चाल है जो प्रकृति द्वारा जानवरों को उनके शिशुओं की देखभाल करने के लिए बनाई गई है जो किसी भी प्रजाति के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। हालांकि, शायद प्रकृति यह अनुमान नहीं लगा सकती थी कि ये अलग-अलग जीव भी होंगे।

लेकिन इसके अलावा वे हैं आक्रामक भेड़िए भी थे जिन्हें इंसानों ने अपने आप से दूर रखा था. उन भेड़ियों ने अपने आपको इंसानों से दूर कर लिया था. लेकिन ऐसे जानवर जो अहिंसक और आज्ञाकारी थे उन्हें इंसानों द्वारा समय समय पर पुरस्कृत भी किया जाता था. ग्रामीणों ने उन्हें गोद भी लिया. जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे ही ये जानवर इंसानों के और क़रीब आए. मनुष्यों ने इन को भूख, ठण्ड और शिकारियों से सुरक्षित रखा और अपने परिवार के रूप में देखा.

यह दोनों प्रजातियों के लिए है एक तरीक़े से जीत की स्थिति थी जहाँ पर दोनों प्रजातियों एक दूसरे के फ़ायदे के लिए काम करती हैं, और विज्ञान में इसे Mutualism कहा जाता है. लेकिन भेड़ियों और मनुष्यों के लिए एक सरल नाम था - मित्रता. और इस तरह से इंसानों को उनका सबसे अच्छा दोस्त मिला. वास्तव में, इंसानों ने इससे कहीं अधिक लाभ प्राप्त किया. प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य को भारी शिकारियों का सामना करना पड़ता था. जीवन के संघर्ष के लिए इंसानों ने बहुत से औज़ार भी बनाए. और इस संघर्ष में इंसानों के साथ भेड़ियों का साथ हमेशा रहा था, और यह साथ विश्वास करने लायक और सुरक्षित भी था. इनकी दोस्ती और भी ज़्यादा मज़बूत तब हुई जब इन जानवरों ने दिखाया कि वे इंसानों और गांवों की रक्षा करने से ज़्यादा भी कुछ कर सकते हैं बस उन्हें अलग अलग काम सिखाने की ज़रूरत थी.

उन भेड़ियों को शिकार करने वाले साथियों के रूप में इस्तेमाल करने में बहुत समय नहीं लगा, उन भेड़ियों को शिकार करने वाले साथियों के रूप में इस्तेमाल किया जाता था जो जानवरों को नीचे लाने में मदद करते थे जो कि मनुष्य अकेले सामना नहीं कर सकते थे। और इस रिश्ते में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उन्हें भेड़ों के झुंड की रक्षा करना सिखाया गया। क्योंकि यही वह भेड़ों के झुंड थे, जिन पर इन भेड़ियों के पूर्वज बिना सोचे समझे हमला कर देते थे, लेकिन उस उग्र स्वभाव को मित्रता के स्वभाव ने जीत लिया था. यह इस मित्रता के रिश्ते की सबसे जादुई बात थी. और आज भी यह सबसे पुराना रिश्ता है.

पुरातत्वविदों ने प्रागैतिहासिक मानवों को अपने कुत्तों के साथ दफन भी पाया है। इसी तरह की एक क़ब्र इस्राईल में मिली थी जो 12000 साल पुरानी थी.

अगर आप अपने कुत्ते के साथ खेलते हैं और एक गेंद फेंकते हैं तो मुमकिन है आपका कुत्ता गेंद को पकड़ लेगा और आपको वापस लाकर देगा या फिर उस गेंद को पकड़ लेगा और चला जाएगा और या फिर ऐसा भी हो सकता है की है उस गेंद को ना पकड़े. लेकिन प्रागैतिहासिक कुत्ता ऐसा नहीं करेगा. और अगर आप एक प्रागैतिहासिक बीड़ी के लिए एक छोटी गेंद भी फेंकेंगे तो वह पहले उस गेंद के ऊपर हमला करेगा और उसके बाद आपके ऊपर.

प्रागैतिहासिक भेड़िए के साथ खेलने के लिए आपको सूर्यास्त का इंतज़ार करना पड़ेगा. वे रात में बहुत सहज महसूस करते हैं, खासकर क्योंकि उनकी आँखें अंधेरे में देखने के लिए अनुकूलित होती हैं। इसके अलावा आप किस इलाक़े में है इसका भी इन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. वे अपने पंजे का उपयोग किसी भी इलाक़े पर कुशलतापूर्वक कर सकते हैं. आप चाहें तो उसके साथ भर में भी खेल पाएंगे. उनके पैर की उंगलियों के बीच फर की एक पतली परत होती है और इसी वजह से वे अन्य गैर-अनुकूलित जानवरों की तुलना में तेजी से बर्फ के रास्ते को पार कर सकते हैं। यही नहीं हम आज भी लागू हो सकते हैं अगर आपके पास एक पालतू भेड़िया या फिर एक wolfdog है तो. प्रागैतिहासिक काल में भेड़िए अपने मनुष्य मालिक को काफ़ी दूर से खोज लेते थे, वे लंबी छलांग लगा सकते थे, और काफ़ी दूर तक सूँघ सकते थे. लेकिन उस समय मनुष्य के लिए एक सबसे बड़ी चुनौती थी, वह थी अपने भेड़िए को दौड़ाना. एक जानवर जो 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से भाग सकता है, मनुष्य उस है कैसे क़ाबू में करेगा. भेड़िये की नाक इंसानी नाक से सौ गुना अधिक सटीक होती है. वे तीन किलोमीटर दूर से अपने इंसान के मालिक का पता लगा सकते हैं.

तो बाक़ी सारे खेल एक तरफ़, लेकिन सबसे ज़्यादा ध्यान रखने की बात यह है कि आप अपने पालतू भेड़िए को अपने आप को काटने न दे. एक भेड़िये का काटने भयानक रूप से मजबूत होता है और उनके बेहद तीखे दांत कुत्ते के कुत्ते की तुलना में कहीं अधिक गहरे मांस से छेद कर सकते हैं।

लेकिन हज़ारों सालों के अंतराल में ये कुत्ते काफ़ी बदल गए हैं. इन्होंने एक नई जीवन शैली अपनायी है, एक नया आहार अपनाया है.

और इसका परिणाम?

इनके व्यवहार में काफ़ी परिवर्तन हुए हैं, उदाहरण के लिए इनका शिकार करने का तरीक़ा बदल गया है. पहले ये गुटों में हमला करते थे, लेकिन आज ऐसा नहीं है. वे प्राकृतिक रणनीतिकार हैं. लेकिन कुत्तों ने उस वृत्ति को खो दिया है। यह सब इनको अलग से सिखाने की आवश्यकता है जिसमें अन्य कुत्तों के साथ हमला करना और रणनीति बनाना भी शामिल है. इनमें बहुत से शारीरिक परिवर्तन भी हुए हैं. आपने देखा होगा कि कई भेड़ियों के कान सीधे होते हैं, और कई कुत्तों के कान लटकते हैं. ज़्यादातर पालतू कुत्तों की नस्लें सतर्क कुत्तों में नहीं आती है. और इस प्रकार वे अपने कान की मांसपेशियों का उपयोग कम करते हैं. और आज इनके लिए यह पहलू अनावश्यक हो गया है.

लेकिन आज हमारे घर में पाया जाने वाला कुत्ता एक भेड़िया कहला सकता है. ? लेकिन अगर आपने मुझसे यह सवाल दस हजार पहले पूछा होता तो जवाब शायद हाँ हो सकता था. वर्चस्व के कारण परिवर्तन केवल भेड़ियों के लिए ही नहीं बल्कि सभी पालतू प्रजातियों में हुआ है, यहां तक कि पौधों के लिए भी यही नियम है. लेकिन भेड़ियों के लिए, ये परिवर्तन इतने स्पष्ट थे कि उन्होंने नई प्रजातियों को जन्म दिया।

लेकिन वे इतने अलग कैसे हो गए?

धरती गृह पर केवल एक ही नस्ली के भेड़िया नहीं थे. भेड़ियों की भी कई अलग अलग नस्लें थी जो की गई कुत्तों की नस्लों को उत्पन्न करती थी. इंसानों ने भेड़ियों को पालने का काम कुछ चार हज़ार साल पहले से करना शुरू किया था. इसलिए आज भी बहुत से कुत्तों की नस्लें भेड़ियों के समान हीं हैं , विशेष रूप से क़द काठी में.

लेकिन मनुष्यों ने रोमन साम्राज्य के दिनों से ही कुत्तों के विकास में सक्रिय रूप से ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया था। Romans ने सीखा कि कुत्तों को कैसे नियंत्रित किया जाए, बड़े जानवरों के उत्पादन के लिए विभिन्न नस्लों को Cross breed किया जाए। और इस तरह के प्रयोगों में सफल होने के बाद, उन्हें छोटे जानवरों का उत्पादन करने में भी देर नहीं लगी। और एक समय ऐसा भी आया जब रोमन साम्राज्य में केवल Lap dogs ही दिखाई देते थे. अठारहवीं शताब्दी में,अंग्रेज़ी की सम्भावनाएँ कई नस्लों की क्रॉस ब्रीडिंग को बढ़ावा देना शुरू किया, जो की शिकार और चरवाहों के लिए अधिक अनुकूल जानवरों को जन्म देते हैं. उस समय के दौरान, विभिन्न नस्ल के उत्पादन की प्रथा पूरे यूरोप और अमेरिका में फैल गई। और आज के समय लगभग हर देश की नस्ल के कुत्ते मौजूद है. जैसे 1960 में ब्राज़ील के Mustiff को एक नस्ल के रूप में मान्यता दी गई थी. और इसी कड़ी में ब्राज़ील के ही Terrier और Fox paulistinha का नाम भी आता है.

और इन नस्लों में आगे चल के विकास हुआ जिससे दूसरे बुद्धिमान कुत्तों और भेड़ियों का जन्म हुआ. उदाहरण के तौर पर कुत्ते की एक नस्ल है, Pug, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह विशाल तिब्बती मास्टिफ का वंशज है. और उनकी विशेषता उनकी muzzle है। इस कुत्ते को चीन में विकसित किया गया था जहाँ कई छोटी-छोटी नस्लों का उत्पादन किया गया था, जैसे की कुछ उल्लू जो भेड़ियों से सबसे अलग हैं। कई अलग-अलग कुत्तों की नस्लों की खोपड़ी का विश्लेषण करके, हम देख सकते हैं कि कई कुत्तों की नस्लें न केवल भेड़ियों से बहुत दूर हैं, बल्कि एक-दूसरे से भी दूर हैं। लेकिन इन सभी अलग-अलग कुत्तों की नस्लों में भेड़िए का डीएनए अभी भी दुनिया भर के सभी कुत्तों में मौजूद है। तथ्य यह है कि दोनों प्रजातियों का एक जैसा स्वभाव उनके आनुवंशिक कोड में संग्रहीत हैं, और इसे वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है। हाउलिंग एक भेड़िया के संवाद के मुख्य तरीकों में से एक है। वे इसका उपयोग अपने क्षेत्र को चिह्नित करने और यहां तक कि शिकार से पहले की क्रियाओं को समन्वित करने के लिए करते हैं। और एक चेतावनी के रूप में, होलिंग उनके शिकार को डराता है। कुत्तों में अभी भी यह वृत्ति है,। तभी वे howl करते हैं। यह इस बात का सबूत है कि ये कुत्ते एक दिन एक भेड़िये के रूप में थे, और उनमें से एक हिस्सा howling है।

इंसान और कुत्ते

यह शायद हमारे ग्रह के इतिहास में सबसे मजबूत दोस्ती हो सकती है। लेकिन लेकिन क्या आपको पता है कि इस दोस्ती की शुरुआत एक दुर्घटना से हुई और जिसने हमारी दुनिया और सभ्यता के इतिहास को बदल दिया। आज हम जहां हैं, वहां पहुंचने के लिए मानव जाति ने एक लंबा सफर तय किया है। और यात्रा के हर चरण में, हमारे पास एक कुत्ता था। यह दुनिया के अब तक के सबसे मजबूत गठबंधनों में से एक है। इतिहास की हर बड़ी घटना के गवाह हम इंसान भी थे और हमारे कुत्ते भी। वे एक स्टेटस सिंबल रहे हैं, और उन्होंने युद्ध भी लड़े हैं,। उन्होंने शहरों की रक्षा की है, लोगों को खतरे में बचाया है। और यहां तक कि अंतरिक्ष में जाने से पहले हमने किया, हमने हमारे दोस्त को भेजा। अगर मोहन की बात करें तो वह हमारा दोस्त है। यदि वे आज हमारे जीवन का हिस्सा हैं, तो हम अपने पूर्वजों के लिए एहसानमंद हैं। आखिरकार यह केवल इसलिए संभव था क्योंकि आदिमानव मनुष्यों को एहसास हुआ कि इस तरह की खतरनाक दुनिया का सामना करना तब आसान होता है जब आपके पास सबसे अच्छा दोस्त होता है।

सौभाग्य से हमारे लिए भेड़ियों को उसी का एहसास हुआ। और इस तरह से मनुष्यों और कुत्तों ने पूरे पशु साम्राज्य में सबसे मजबूत बंधन में से एक का निर्माण किया।

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