यह सब 1957 में आरंभ हुआ, 4 अक्टूबर को चाँद को धरती का एकमात्र ऐसा उपग्रह बताया गया जो कि धरती की परिक्रमा करता है. जो नया उपग्रह, जिसने धरती की परिक्रमा करना आरंभ किया उसका नाम स्पुतनिक था, इसे सोवियत यूनियन ने प्रक्षेपित किया और अमरीका जो हमेशा से ही सोवियत यूनियन के साथ एक होड़ करता रहा है, उसे इस बात से धक्का लगा क्योंकि सोवियत यूनियन ने अमरीका को पीछे छोड़ते हुए एक बहुत लंबी छलांग मारी थी.


    Claude Chappe ने अपना पहला टेलिग्राफ़ सिस्टम 1790 में डिज़ाइन किया और 22 मार्च, 1792 में अपने सिस्टम को विधानसभा में दिखाया और जहाँ पर विधानसभा ने यह निर्णय लिया कि वो इस टेलिग्राफ़ सिस्टम को फ़्रान्स में लगाएंगे. सितंबर 1, 1793 में पहली टेलिग्राफ़ लाइन बिछाई गई जोकि पेरिस और लेले के बीच में थी. और धीरे धीरे इस लाइन को पाँच हज़ार किलोमीटर तक बढ़ा दिया गया जिसके अंदर पाँच सों टेलीग्राफ स्टेशन काम कर रहे थे. ये दुनिया का सबसे पहला इतना विशालकाय नेटवर्क था जोकि विद्युतीय टेलीग्राफ से पहले बनाया गया था. Chappe के नेटवर्क को फ़्रान्स से भी बाहर फैलाया गया और जिसमें उत्तरी इटली और Franders के कुछ जगहों को शामिल किया गया.


    Public-key cryptography, जिसे दो-कुंजी की सुरक्षा भी कहा जाता है, एक बहुत ही सरल लेकिन साथ ही साथ बहुत ही कठिन प्रक्रिया है जिसमें उपयोग कर्ता के पास एक निजी और अत्यंत गोपनीय कुंजी होगी और एक सार्वजनिक कुंजी होगी जिसे उपयोगकर्ता कहीं भी इस्तेमाल कर सकता है चाहे वह नेटवर्क सुरक्षित हो या असुरक्षित हो. सार्वजनिक कुंजी से सारे संदेश एन्क्रिप्ट किए जाते हैं जोकि साफ़ सरल भाषा में लिखे हों और जिनको एन्क्रिप्ट करने के बाद पढ़ा नहीं जा सकेगा. किसी भी गोपनीय संदेश को भेजने के लिए उस संदेश को पाने वाले की सार्वजनिक कुंजी से एन्क्रिप्ट करना होगा. और जब प्राप्त कर्ता उस संदेश को प्राप्त कर लेगा तब उसको अपनी निजी कुंजी से decrypt कर लेगा. यह एक बड़े मेल बॉक्स की तरह है जिसमें दो ताले लगे हैं एक ऊपर और एक नीचे,ऊपर वाला तालासार्वजनिककुंजी से खुलेगा और उसमें संदेश डाला जा सकेगा लेकिन संदेश निकालने के लिए नीचे वाला ताला खोलना पड़ेगा जो कि केवल निजी कुंजी से ही खोलेगा और इस तरह से केवल उस संदेश का मालिक ही उसे प्राप्त कर पाएगा.


    इंटरनेट की शुरुआती दिनों में प्रोग्रामर अपना काम पैसों के लिए नहीं करते थे वो सिर्फ़ इंटरनेट को बढ़ाने के लिए और उसमें रिसर्च करने के लिए काम करते थे | वो अपनी जानकारी को दूसरों के साथ बाँटना चाहते थे और दूसरे लोगों की ज़रूरत के हिसाब से प्रोग्राम लिखना चाहते थे | यह उस समय की बात है जब पूरी दुनिया इंटरनेट और ई मेल से आपस में जुड़ चुकी थी या फिर जुड़ने की शुरुआत हो चुकी थी, और इस तरह से प्रोग्रामर अपने आइडिया और अपनी जानकारी को दूसरे लोगों के साथ साझा करते थे, उस समय प्रोग्रामर प्रोग्राम लिखते थे लोगों की ज़रूरत के हिसाब से, और इसके बदले में वो कोई पैसा नहीं लेते थे | कोई भी नया सॉफ़्टवेयर आता था या फिर कोई भी नया प्रोग्राम आता था वो किसी भी बड़ी कम्पनी के द्वारा नहीं बनाया गया होता था | और जब कोई ऐसा प्रोग्राम किसी बड़ी कंपनी ने नहीं बनाया जिसे सारे उपयोगकर्ता इस्तेमाल कर रहे होते थे, तो उन लोगों से बात करने के लिए काफ़ी संयम की ज़रूरत पड़ती थी | इस काम में जो पुरानी यूनिवर्सिटीज थी, जिन्होंने इंटरनेट की शुरुआत करने में अपना योगदान दिया, ने इन प्रोग्रामर की काफ़ी मदद की |


    आज जो हम लंबी दूरी में बातें करते हैं उन सब बातों के पीछे का राज एक मशीन के पास है, यह बहुत ही छोटी सी मशीन है जिसके किनारे तारों से जुड़े हुए होते हैं और आज के आधुनिक समय में तारों की जगह सिग्नल्स ने ले ली है | इन मशीनों में हम जो भी बात करते हैं वह यह बातें एक कंपन में परिवर्तित हो जाती हैं और वह कंपन तारों के माध्यम से या फिर सिग्नल के माध्यम से दूसरी तरफ़ पहुँच जाती है और वापिस से आवाज़ में बदल जाती है | आज भी बहुत से बच्चे अपने खेल में ऐसी छोटी मशीन बनाते हैं जिसके लिए वे छोटे टीन के डब्बों का इस्तेमाल करते हैं और उन डब्बों को वह आपस में 1 लंबी तार से जोड़ देते है कभी कभी टीन के डब्बों की जगह वो गत्ते के डब्बे भी इस्तेमाल करते हैं | तो इतनी बातों के बाद आपको पता लग गया होगा कि मैं आपसे किस मशीन के बारे में बात कर रहा हूँ, हम टेलीफ़ोन के बारे में बात कर रहे हैं |


    क्या बीसवी सदी में इस बात पर कोई विश्वास करेगा कि हमारे अलावा भी इस ब्रह्माण्ड में बुद्धिमान लोग हैं ? क्योंकि हमारी धरती के किसी भी म्यूज़ियम में धरती के बाहर के किसी भी इन्सान की ममी नहीं है और उसके बारे में कोई जानकारी नहीं है तो जवाब होगा कि नहीं, हमारी धरती के अलावा ऐसा कोई गृह नहीं है जहाँ पर इन्सान रहते हो | लेकिन आज के समय में जितनी भी खोज हो रही है और रिसर्च हो रही है उसको देखकर हम सब के मन में ऐसे हज़ारों सवाल उमड़ते होंगे कि क्या हम हीं है जो कि इस धरती पे रहते हैं या फिर हमारी धरती जैसी और भी कोई धरती हो सकती है इस ब्रह्माण्ड में जहाँ पर इंसानों की तरह लोग रहते हो |


    आज के ज़माने में अर्थव्यवस्था कैसे काम करती है ये शायद ही कोई जानने में दिलचस्पी लेगा | रोमन सभ्यता ज़्यादातर कृषि के ऊपर निर्भर थी | शहरी के साथ जिनके पास छोटे ज़मीनों के टुकड़े हुआ करते थे | यह इस तरीक़े के लोग होते थे जबकि अपनी पूरी ज़िंदगी इन छोटी ज़मीनों के टुकड़ों पर बिता देते थे | रोम सभ्यता में ग़ुलामों से बहुत अच्छे से पेश किया जाता था इस सभ्यता में हज़ारों की तादाद में ग़ुलाम थे | यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि रोम के ग़ुलाम अमरीका और यूरोप के ग़ुलामों से काफ़ी अलग थे |


    बहुत लंबे समय तक हमारे पास कोई भी सही नक़्शा नहीं था | यह नक़्शा 1300 में बनाया गया था | और इसे एक बार देख कर समझना मुश्किल काम है | जैसा हमने अब तक नक़्शा देखा है उसके हिसाब से इसको को समझना काफ़ी मुश्किल काम है |


    सुबह उठने के बाद एक दम से ऐसा लगे कि कुछ तो ग़लत हुआ है ऐसा लग रहा है कि जैसे बुखार है बदन टूट रहा है और पेट में भी दर्द है | थोड़ा दर्द सहने के बाद आप इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अब तो डॉक्टर के पास जाना ही पड़ेगा और डॉक्टर के पास जाने के बाद डॉक्टर आपको कुछ दवाइयां देता है जिससे आपको आराम मिलता है और जो कि आपकी बीमारी के बैक्टीरिया को मार देता है | लेकिन एक जो चीज़ है ये है कि डॉक्टर भी आपसे बहुत सारी बातें पूछेगा जैसे की क्या आपको उल्टी आयी या फिर आपका पेट साफ़ है या नहीं वग़ैरह वग़ैरह | ऐसा भी हो सकता है कि डॉक्टर आपको बोले कि आपका ब्लड सैंपल लेना पड़ेगा या फिर आपका urine सैंपल लेना पड़ेगा क्योंकि हो सकता है कि आपको कोई वायरल इंफेक्शन हो जो की दवाइयों से ठीक नहीं होता |