सॉफ्टवेयर या जासूसी - भाग प्रथम

सूचना प्रौद्योगिकी में माइक्रोसॉफ्ट का एकाधिकार है , ये बात हम सब जानते है , लेकिन क्या आपको पता है की माइक्रोसॉफ्ट को इन सबसे सिर्फ और सिर्फ 2 % की सेल होती है , या यूं कह लीजिए की दुनिया की सॉफ्टवेर की बिक्री में माइक्रोसॉफ्ट का बस 2 प्रतिशत ही योगदान है | लेकिन हमें इस मामले में क्यों चिंतित होना चाहिए | क्या आपको नहीं लगता की यह संख्या झूठी हो सकती है | क्योंकि माइक्रोसॉफ्ट एक बहुत ही पुरानी कंपनी है और उस पर भी सिर्फ 2 प्रतिशत की सेल ?

अगर हम अलग से देखें तो अकेले माइक्रोसॉफ्ट के सॉफ्टवेर की बिक्री ही 41% है , उसके अलावा दुनिया के 85% कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट का विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम चल रहा है | और इस तरह से माइक्रोसॉफ्ट को अपना 90 प्रतिशत तक के बिज़नस को कण्ट्रोल करने की कोई ज़रुरत नहीं है, क्योंकि उसे पैसा मिलेगा ही मिलेगा लेकिन इन सब के अलावा समाज को नियंत्रित करने के लिए माइक्रोसॉफ्ट को बस ०.1 प्रतिशत संसाधनों को ही नियंत्रित करने की ज़रुरत है , और इन सब में वो संसाधन आते है जिन्हें हम रोज की ज़िन्दगी में इस्तेमाल करते है , जैसे, रेडियो स्टेशन, टीवी स्टेशन, इन्टरनेट, टेलीफोन नेटवर्क आदि, इन सभी जगहों पर माइक्रोसॉफ्ट पहले से अपना जाल फैला चुका है , इसमें कोई दो राय नहीं|

आज की दुनिया में सबसे ज्यादा ज़रूरी चीज़ है जानकारी , आज की दुनिया में इससे बड़ी चीज़ और क्या हो सकती है | और अगर सिर्फ एक कंपनी इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा हासिल करने की कोशिश करे, तो ये लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता है | आज के समय में हम सीखते है कंप्यूटर से, हम काम करते है कंप्यूटर पर , हम अपना मनोरंजन भी कंप्यूटर पर करते है, हम कुछ खरीदते है तो वो भी कंप्यूटर पर | इस तरह से कंप्यूटर ने हमारी ज़िन्दगी में एक ऐसे जगह बना ली है जिस जगह से हम कंप्यूटर जैसे चीज़ को कभी बाहर नहीं निकल सकते |

लेकिन क्या सिर्फ माइक्रोसॉफ्ट ही इन सबमें एक खिलाडी है, नहीं... इंटेल भी बहुत हद तक माइक्रोसॉफ्ट से ही मिलता जुलता है |

माइक्रोसॉफ्ट और इंटेल एक साथ मिलकर काम करते है | माइक्रोसॉफ्ट नए सॉफ्टवेयर बनाता है और उन सॉफ्टवेयर को चलने के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है , और इस तरह से इंटेल ज्यादा तेज़ चिप्स का निर्माण करता है , जिससे माइक्रोसॉफ्ट के द्वारा बनाये गए सॉफ्टवेयर उन चिप्स के कंप्यूटर पर अच्छे से चल सके| और इस तरह से माइक्रोसॉफ्ट और इंटेल बहुत नज़दीक है , और कई लोगो ने तो इनको Wintel का नाम भी दे दिया है | और इस तरह से ये दोनों कंपनी 90 प्रतिशत से भी ज्यादा कमाते है | एक तरफ जहा चिप की नक़ल करके कोई भी नकली चिप बनाई जा सकती है उसी तरह से एक ऑपरेटिंग सिस्टम भी किसी भी चिप के ऊपर चलाया जा सकता है, IBM , AMD , और Cyrix सभी चिप्स बनाते है जिन पर विंडोज चल सकता है , और इनके बनाये चिप्स काफी सस्ते भी होते है , लेकिन फिर भी विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम इन चिप्स पर नहीं मिलता है |

एक समय था जब सरकार लोगो पर नज़र रखने के लिए कैमेरो का उपयोग करती थी, लोगो को पता होता था की उनको देखा जा रहा है और उनकी प्राइवेट लाइफ पर नज़र राखी जा रही है , कई बार तो लोग कैमेरो को तोड़ भी देते थे क्योंकि उनको अज़्ज़ादी चाहिए थी, लेकिन आज सब कुछ बदल चुका है , आज लोग खरीददारी से लेकर एग्जाम , इंटरव्यू और मनोरंजन तक कंप्यूटर पर करते है , और अपनी निजी और सार्वजनिक जीवन को एक तरह से कंप्यूटर के हवाले कर देते है | क्या आप जानते है की आपकी यह सब जानकारी किसी के भी हाथो में जा सकती है , और आपको पता भी नहीं चलेगा, और तो और यहाँ पर कैमेरो की ज़रुरत भी नहीं है | तो अगर किसी की जासूसी करनी है तो बस उसके कंप्यूटर की जासूसी करने की जरूरत है |

ो इसका मतलब यह हुआ की माइक्रोसॉफ्ट हम सबकी ज़िन्दगियों के ऊपर नियंत्रण चाहता है ? शायद नहीं... क्योंकि अभी तक तो हम यही देखते आये है की माइक्रोसॉफ्ट को अपना दबदबा बनाये रखना है और इसके लिए सबसे जरूरी है की जानकारियो के ऊपर ना सिर्फ नज़र रखी जाये बल्कि उनको बटोरा भी जाये | आपने बहुत बार देखा होगा की कुछ वेबसाइट इन्टरनेट एक्स्प्लोरर पर आराम से खुलती है और वही वेबसाइट किसी दुसरे ब्राउज़र पे नहीं, ऐसा इसलिए क्योंकि माइक्रोसॉफ्ट ने उन वेबसाइट बनाने वालो को इस बात के लिए राजी कर लिया है की उनकी वेबसाइट इन्टरनेट एक्स्प्लोरर पे न सिर्फ सबसे तेज खुलेगी बल्कि यूजर के लिए सेफ भी रहेगी| और तो और ऐसे भी बहुत से वेबसाइट है जिनको अगर आप क्रोम या मोज़िला पे खोलेंगे तो आपको मैसेज मिलेगा की ये वेबसाइट इन्टरनेट एक्स्प्लोरर पे ज्यादा अच्छे से दिखेगी |

आज की अर्थव्यवस्था एक ऐसी जगह है जहा पर हर किसी को ग्राहक चाहिए और एक इंसान की जानकारी , की वो क्या खाता है से लेकर कहा कहा पर घूमता है? किसी भी व्यापारी के लिए बहुत ज़रूरी है, वो इस जानकारी से अपने सामानों की मार्केटिंग कर सकता है, और सीधे उन लोगो से संपर्क कर सकता है जो इस तरह के सामानों का इस्तेमाल करते हो | 2 3 साले पहले तक माइक्रोसॉफ्ट के ऑपरेटिंग सिस्टम अपनी साख खोते जा रहे थे, और लोगो को लगने लगा था की माइक्रोसॉफ्ट में अब वो बात नहीं रह गयी है , माइक्रोसॉफ्ट को गूगल से सीधी टक्कर मिल रही थी , लेकिन उसी दौरान माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज 10 लांच और वो भी मुफ्त में, सबके मन में ये सवाल था की माइक्रोसॉफ्ट ने ऐसा क्यों किया, इतना बड़ा नुक्सान झेलकर माइक्रोसॉफ्ट को क्या मिला ?

इसमें कोई शक नहीं की माइक्रोसॉफ्ट मार्किट में दबदबा बनाये रखना चाहता है, पहले इसी बाजार को IBM , HP जैसी कम्पनीज ने अपने जाल में फंसा रखा था, और माइक्रोसॉफ्ट इनके आगे कुछ नहीं था , इनको पीछे करने के लिए माइक्रोसॉफ्ट ने सबसे पहले कॉर्पोरेट जगत को अपने जाल में फंसाया | उसके बाद बारी आयी इन्टरनेट की, माइक्रोसॉफ्ट ने कुछ ऐसा मौहाल बनाया जिससे लगे की इन्टरनेट माइक्रोसॉफ्ट के द्वारा ही बनाई गयी कोई टेक्नोलॉजी है | माइक्रोसॉफ्ट ने msn.com को कुछ इस तरह से बनाया की इसमें जाते ही लोगो को लगता था की अब वो इन्टरनेट का इस्तेमाल कर सकते है |

ो सवाल यह है की किस तरह से माइक्रोसॉफ्ट ने २० साल से भी कम समय में एक ऑपरेटिंग सिस्टम को इतना आगे बढ़ा दिया की ज्यादातर लोगो के कंप्यूटर पर यह नज़र आने लगा | ऐसा माना जाता है की बिल गेट्स और उनके सहपाठी पॉल एलन ने मिल कर बेसिक प्रोग्रामिंग लैंग्वेज बनाई , लेकिन असली में इसको जॉन केमेंय और थॉमस कुर्ट्ज ने लिखा था , इन लोगो ने तो बस बेसिक प्रोग्रामिंग लैंग्वेज को पढ़ने के लिए एक इंटरप्रेटर बनाया था | उस समय तक कंप्यूटर्स आम लोगो की पहुँच तक नहीं थे, यहाँ तक की बड़े बड़े बैंक्स, रिसर्च सेंटर भी कंप्यूटर्स के बारे में अनजान थे, उस समय तक सिर्फ सरकारी कार्यालयों में ही कंप्यूटर दिखते थे , यहाँ तक की IBM जैसे कंपनी भी कंप्यूटर बेचती नहीं थी, वो भी कंप्यूटर्स को किराये पे देता था और अपने ग्राहकों से इन कंप्यूटर्स की मेंटेनेंस की रकम वसूलता था | और इस तरह से IBM ने बहुत लाभ भी कमाया लेकिन अगर चाँद पे पहुचना था तो कंप्यूटर्स का छोटा होना बहुत ज़रूरी था |

और इस तरह सरकार ने जनता के टैक्स को टेक्नोलॉजी में लगाया और बहुत सारी छोटी छोटी कंपनी बनाई जहा पे कंप्यूटर के पार्ट बना कर अस्सेम्ब्ल किया जाता था | इस समय तक कंप्यूटर लेना मतलब एक शौक को पूरा करना होता था क्योंकि २ + २ की गणना करने के लिए भी एक बड़ा प्रोग्राम लिखना पड़ता था , लेकिन 1970 आते आते , बहुत से सॉफ्टवेयर आ गए थे जिन्होंने एकाउंटिंग को बहुत ही आसान बना दिया था |

और इस तरह से जब पहले Apple और commodore कंप्यूटर्स आये तो आम लोगो ने भी इनको अपनाना शुरू किया, और तब से एक असली कंप्यूटर बिज़नस की शुरुआत हुई क्योंकि अब कंप्यूटर लोगो के बीच पहुचने लगा था | लेकिन अब IBM के लिए एक परेशानी हो गयी थी, क्योंकि अब लोग कंप्यूटर्स खरीदने लगे थे और IBM कंप्यूटर्स को किराये पे देता था| और जिस तरह से कंप्यूटर बनने लगे और लोगो ने इनको खरीदना शुरू किया वैसे ही ऑपरेटिंग सिस्टम की ज़रुरत पड़ने लगी |

उस समय इंटेल 8088 प्रोसेसर के साथ बाजार में था और साथ के माइक्रोसॉफ्ट जो की 1975 की एक स्टार्टअप कंपनी थी भी बाजार में आ चुकी थी| शुरुआत में एलन और बिल गेट्स का ऑपरेटिंग सिस्टम के बाजार में उतरने का कोई इरादा नहीं था क्योंकि उस समय तक दुसरे अच्छे ऑपरेटिंग सिस्टम बाजार में आ चुके थे जैसे डिजिटल रिसर्च का "CP-M" , इस सबसे माइक्रोसॉफ्ट को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था क्योंकि उसका काम प्रोग्रामिंग लैंग्वेज पर था | लेकिन साथ ही माइक्रोसॉफ्ट सब तरफ अपने नज़ारे बनाये हुए था, और उसने "Seattle Computers" से पचास हज़ार डॉलर में उसका ऑपरेटिंग सिस्टम "QDOS" जिसे quick and Dirty Operating System कहा जाता था, को खरीद लिया |

माइक्रोसॉफ्ट ने इसे एमएस-डॉस बनाने के लिए इस्तेमाल किया, और आईबीएम ने अपने कंप्यूटर पर इसके उपयोग करने के लिए एक लाइसेंस खरीदा | IBM के कंप्यूटर्स काफी निचली क्वालिटी के थे और वही Apple || के कंप्यूटर बढ़िया क्वालिटी के, लेकिन उस समय IBM की पहचान एक अच्छी सर्विस देने वाली कंपनी के रूप में हो चुकी थी , तो IBM ने अपने कस्टमर्स से कहा की हमारे कंप्यूटर्स खरीदिये, अगर कोई समस्या आएगी तो हम इनको उसी समय ठीक करेंगे या फिर अड़तालीस घंटो में बदल देंगे| और APPLE || बनने वाले कहते थे की वो लोग कंप्यूटर्स बेच रहे है जो स्टीरियो सिस्टम बेचते थे |

लेकिन IBM ने कभी कंप्यूटर्स और ऑपरेटिंग सिस्टम के बारे में सही से नहीं सोचा | और इसका नतीजा रहा माइक्रोसॉफ्ट का MS-DOS और फिर विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम| माइक्रोसॉफ्ट की बाजार को देखने का नज़रिया हमेशा से ही IBM से अच्छा रहा | और इसलिए माइक्रोसॉफ्ट कुछ ही सालो में IBM की टक्कर में आ गयी |

इसे माइक्रोसॉफ्ट की दूरदर्शिता ही कहेंगे की उसने पहले ही पहचान लिया था की netscape navigator जो की एक ब्राउज़िंग प्रोग्राम था, बहुत बड़ा पासा था | उस समय तक माइक्रोसॉफ्ट के प्रोडक्ट बस अमरीका तक ही थे, और माइक्रोसॉफ्ट को ये भी नहीं पता था की उसका माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल फ्रांस और अमरीका के लोगो को किस तरह से जोड़ेगा , कैसे एक एक्सेल की शीट फ्रांस में बनेगी और अमरीका में उसका इस्तेमाल हो सकेगा. और किस तरह से कोई कंप्यूटर सिस्टम एक नेटवर्क से जुड़ सकेगा |

लेकिन जो सबसे बड़ी बात माइक्रोसॉफ्ट में थी, वो थी अपने प्रोडक्ट्स को बेचने की कला, भले ही माइक्रोसॉफ्ट के सॉफ्टवेयर शुरुआत में गलतिओ से भरे हो, लेकिन माइक्रोसॉफ्ट लोगो को इस बात के लिए मना ही लेता था की भविष्य में यह सॉफ्टवेयर गलतिओ से भरे नहीं होंगे| और इस तरह से माइक्रोसॉफ्ट अपने ग्राहकों से पैसा कमाता था |

धीरे धीरे यह कंपनी उस स्थिति में आ गयी जब ये किसी चीज़ को जांचने के लिए हज़ार मिलियन डॉलर खर्च करने की स्थिति में थी | जब तक कोई सॉफ्टवेयर काम करने लायक नहीं हो जाता था, उस सॉफ्टवेयर को सुधार में रखा जाता था, इसका एक बड़ा उदाहरण था "MSN" , लेकिन यह भी नहीं चला , क्योंकि उस वक़्त "MSN" का मुकाबला "AOL" से था जो "MSN" से १३ करोड़ ग्राहकों से आगे था. बाद में माइक्रोसॉफ्ट को "MSN" को फ्रांस और जर्मनी के लोकल डिस्ट्रीब्यूटर्स को बेचना पड़ा था | लेकिन ठीक इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट ने "Hotmail" को ख़रीदा जिसके पहले से ९ करोड़ उपभोक्ता थे |

माइक्रोसॉफ्ट के बेचने की कला से सब हैरान थे, एक्सेल जो की गलतिओ से भरा हुआ एक सॉफ्टवेयर था, के पहले वर्शन की रिकॉर्ड बिक्री हुई. फिर चाहे वो विंडोज का ३.० वर्शन हो या फिर इन्टरनेट एक्स्प्लोरर का शुरूआती वर्शन हो, सभी अपने अपने प्रतियोगी सॉफ्टवेयर से बहुत पीछे थे. लेकिन फिर भी माइक्रोसॉफ्ट की सेल्स लगता बढ़ती जा रही थी |

अगर कोई कंपनी अपने अच्छे सॉफ्टवेयर से मुनाफा कमाए तो बात समझ आती है लेकिन यहाँ मामला उल्टा था सो अदालत ने माइक्रोसॉफ्ट के विरुद्ध एक अविश्वास इन्वेस्टीगेशन बैठाया जिसका काम यह पता लगाना था की किस तरह से माइक्रोसॉफ्ट को इतना फायदा हो रहा है |




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